अभिलाषा

आदमी भाग रहा बेतहाशा
नित नूतन अभिलाषा,

आदमी भाग रहा बेतहाशा।
आसमां छूने की चाहत,
बढ़ रही जीवन प्रत्याशा।।
आदमी भाग रहा बेतहाशा
नित नूतन अभिलाषा

चैन सूकून सब खो रहा,
पैसों के पीछे दौड़ रहा।
रहा नहीं सहज जीवन,
ईर्ष्या क्षोभ में बना दुर्वासा।।
आज कल मोहब्बत में पहले सी बात कहां

इच्छाओं पर नहीं लगाम,
कदम – कदम शाम – दाम।
भ्रमित कर रही माया,
तृप्ति नहीं और की आशा।।

आकुल अन्तर क्षण प्रहर,
स्नेह सुधा से रिक्त घर।
ज़िन्दगी में घुलता जहर,
बदल रही जीवन परिभाषा।।

सुख -साधन जुटाया प्रचुर,
अपनों से होकर के दूर।
अकेलेपन की बौखलाहट,
घेरती जा रही निराशा।।

सुषमा सिंह
औरंगाबाद
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( सर्वाधिकार सुरक्षित एवं मौलिक)

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