अहिंसा का हथियार -सुषमा सिंह

परतंत्रता की बेड़ियों में,
कराह रहा था हिन्दुस्तान।
हिंसा प्रतिहिंसा लूटपाट से,
सारा देश था हलकान।।

अत्याचार के दौर में,
शहादतों का जोर था।
भगत चंद्रशेखर तिलक,
बोस नाम का शोर था ।।

गाॅंव शहर उभरने लगे थे,
अंग्रेजों के विरुद्ध स्वर।
स्वतंत्रत करो भारत को,
हिन्दुस्तान है हमारा घर।।

कहीं भगत ‌ झूले फांसी,
चंन्द्रशेखर ने दिया बलिदान।
सर्वत्र मची थी त्राहि-त्राहि,
जल रहा था हिंदुस्तान।।

आया तब अफ्रीका से,
एक देवदूत लकुटिया लेके।
जंगे आजादी में कूद पड़ा,
अंग्रेजों की हिली चूलें।।

सत्य अहिंसा का सारथी,
आया जब चम्पारण।
देख गोरों का अत्याचार,
भर आया था मन।।

सत्याग्रह पदयात्रा कर,
नगर गांव किया शंखनाद।
उत्सर्ग करो प्राण देश पर,
होने ना दो देश बरबाद।।

बोस, नेहरू, तिलक प्रसाद,
मिलकर सब साथ लडे।
उग्र हुआ आन्दोलन,
अंग्रेजों के पांव उखड़े।।

मिली तब हमें आजादी,
तीर ना तलवार से।
बापू की कर्मठता और,
सत्य अहिंसा के हथियार से।।

सुषमा सिंह
औरंगाबाद
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