खंजर खाये है पीठ पर-योगेश सिंह धाकरे चातक

कविता

मान सम्मान और अभिमान
मानव का ताज होना चाहिये
विपत्ति और समस्या मे जो
निखरे वो साज होना चाहिये

लोग जीते है अात्म सम्मान और
अभिमान की चाहो मे
दर्द देते हे अपने खास ही गम से
से भरी राहो मे

हमारा सम्मान करना इनका सगा
होना ही इनका हथियार है
रिश्तो मे भी राजनीति कूटनीति
करना लोगो की अाम बात है

बहुत सुंदर यह रचना है, क्लिक कीजिए

कितने खंजर खाये है पीठ पर
अपने ही सगो के हमने
गणना करना ही छोड़ दिया है
घाओ नासूरो की हमने

राहो के शूल ही फुल लगते है
जिन्दा दिली की मिशाल चाहिये
समस्याऐ व्यापकता से फैली है
बस ह्रदय विशाल चाहिये

स्वरचित
….योगेश सिंह धाकरे चातक
………अालिराजपुर म.प्र

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