चुनौती पूर्ण स्कूली शिक्षा

ऐसे तो प्रारंभ से प्रारम्भिक के साथ उच्च शिक्षा का क्षेत्र चुनौतियों भरा रहा है लेकिन वर्तमान में पहाड़ के समान चुनौतियां खड़ी दिखाई दे रही हैं। ये चुनौतियां ग्रामीण क्षेत्रों के लिए जितनी अधिक हैं उससे कम शहरी क्षेत्रों के लिए भी नही हैं। अभी तक विविड19 के कारण प्रायः प्राथमिक विद्यालय बंद ही हैं। खुलने के नाम पर वर्ग 6 से ऊपर के विद्यालय खुल गए हैं। इन खुले विद्यालयों में भी विभिन्न प्रकार की बंदिशें लागू हैं जो कोविड से बचने के लिए आवश्यक हैं। ग्रामीण हो या शहरी सभी विद्यालयों में बच्चों की उपस्थिति प्रारंभ में तो बढ़- चढ़ कर रही लेकिन धीरे- धीरे कम होने लगी। इन बच्चों को विद्यालय लाना और पढ़ाई के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने में आज शिक्षक जी -जान से मिहनत करते नजर आ रहे हैं।
जब हम ग्रामीण क्षेत्रों को देखते हैं तब स्थिति अत्यंत चुनौतियों भरी नजर आती हैं।ग्रामीण क्षेत्र के बच्चे लगभग शिक्षा से कट चुके हैं। कहने को तो ऑनलाइन शिक्षा दी जा रही है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में एंड्रॉइड मोबाइल की भारी कमी के कारण बच्चे शिक्षा से दूर होते गए। अब बिभिन्न इलाकों में मुहल्ला या टोला क्लास चलाया जा रहा है ।प्राथमिक वर्ग के बच्चे यहाँआने से अच्छा घरेलू कार्य या बकरी चराने अथवा खेलने कूदने में ही लगे रहना चाहते हैं। शिक्षकों के लिए भी समस्या यह है कि न तो बच्चों के साथ जोर जबर्दस्ती कर सकते हैं और न ही बच्चों की भीड़ लगा सकते हैं। ऐसे में अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे पढ़ना -लिखना भूल चुके हैं।उन्हें पुनः रास्ते पर लाने के लिए कठोर प्रयास करने होंगे। नियमानुसार बच्चों को एक वर्ग से दूसरे वर्ग में प्रोन्नति दे दी जा रही, जिससे बुनियाद ही खोखली हो रही।विभिन्न सर्वे में इस प्रकार के रिपोर्ट आते रहते हैं कि वर्ग 5 के बच्चे वर्ग 2की पुस्तक नहीं पढ़ पाते।यह भी सत्य है कि कोविड के कारण आज सरकारी स्कूलों में बच्चों के नामांकन में भारी बढोतरी हुई है। अभिभावक प्राइवेट विद्यालयों का भारी भरकम फीस भरना उचित नहीं समझते।अब सरकारी स्कूलों की बुनियादी हालात भी ठीक नही हैं। सरकारी स्कूलों में प्राइवेट स्कूलों की तुलना में शिक्षकों की संख्या तो कम है ही साथ ही शिक्षक विभिन्न प्रकार के गैरशैक्षणिक कार्यों में उलझे रहते हैं, जिसके कारण बच्चों की पढ़ाई से अधिक ध्यान गैर शैक्षणिक कार्यों के समय और सही से निष्पादन कर अपनी सेवा बचाने पर देते हैं।यह हालत तब और गंभीर नजर आती है जब प्राथमिक व मध्य विद्यालयो में प्रायः किरानी बाबू से लेकर चपरासी तक के दायित्वों का निर्वहन शिक्षकों के जिम्मे ही रहता है।

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शहरी क्षेत्रों के बच्चों की स्थिति थोड़ी ठीक है। इनके अधिकांश माता-पिता जागरूक होते हैं।इनके पास मोबाइल भी है।बच्चे ऑनलाइन शिक्षा भी ग्रहण कर रहे । लेकिन अधिकांश बच्चे अब मोबाइल के बिना नहीं रहना चाहते। बच्चे रात -दिन अब मोबाइल से उलझे रहते हैं।पढ़ाई से अधिक बच्चों का ध्यान ऑनलाइन गेम खेलने पर अधिक है। ऐसी स्थिति शहरों के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी कम नहीं है।जिन बच्चों के पास मोबाइल है उन्हें लत लग चुकी है।प्रायः माता- पिता परेशान रहने लगे हैं।बच्चों में स्वास्थ्य की समस्या उत्पन्न होने लगी है।इस प्रकार समस्यायें बहुत ही चुनौती भरी हैं जिनके निदान के लिए अविलंब ठोस कदम उठाने होंगे , नहीं तो आने वाले समय मे डिग्रीधारी अशिक्षितों के साथ अस्वस्थो की फौज खड़ी मिलेगी।
__श्रीराम रॉय

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