धर्म- अधर्म के द्वंद्व में अक्सर संसय उठते हैं

शक्ति ने ली थी जब परीक्षा
राजीवनयन श्री राम की,
संसय का भय उठा था
तब मन में श्री भगवान की।

पूजा के लिए थे जो पुंडरिक
हो गया था अदृश्य कोई इक,
उठ रहा था मन में कोई खीझ
नहीं हो रहा था हृदय निर्भीक।

नारी उद्धार का था संकल्प
सिद्धि का था न कोई विकल्प,
संसय ने घेरा था मन को
मन धिक्कार रहा था पल- पल।

नहीं सूझता है जब कोई उपाय
मन हो जाता है पुरा असहाय,
गूंजता है माँ की पुकार तब
‘कमलनयन’ शब्द बनता है सहाय।

खिल उठता है मस्तिष्क व वक्ष
बढ़ते हैं हाथ निकालने को अक्ष
रोकती है प्रकट होकर शक्ति
विजय आशीष देती पुत्री- दक्ष।

संसयहीन निडर निर्भीक श्रीराम
करते हैं रावण से घोर संग्राम,
मिटता है रावण का अभिमान
सीता का स्थापित होता है सम्मान।

धर्म- अधर्म के द्वंद्व में अक्सर
संसय उठते हैं, मिट जाते हैं,
धर्म संस्थापना कारण देवता
पुष्प -वर्षा करने आते हैं।
—-गोपाल मिश्र, सिवान

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