प्यारी प्यारी प्रकृत्ति के देखो

विश्व प्रकृति दिवस पर

” *प्यारी प्रकृति “*

प्यारी प्यारी प्रकृत्ति के देखो ,
प्यारे प्यारे हैं कण कण।
इसी प्रकृति के  स्पन्दन से,
आनन्दित है अपना क्षण-क्षण।।

इन्हुं  प्रकृति के तत्वों से,
निर्मित अपना जीवन है।
पंचभूत कहलाते हैं ये,
क्षिति ,जल ,पावक ,वायु,गगन हैं।।

आवश्यक है इनका संतुलन,
करने अपना जीवन संतुलित।
इनसे ही निर्मित यह सृष्टि,
शक्ति भरी है इनमे अतुलित।।

आज प्रकृत्ति के दोहन से,
अस्त व्यस्त हुआ वातावरण।
काट रहे हैं हम जंगल सारे,
वृक्षों का देखो हो रहा क्षरण।।

हुआ प्रभावित जन जीवन भी,
और पंचभूत भी हुए   पराभूत।
व्यथित हुई आज प्रकृति हमारी,
अब कौन बन आयेगा देवदूत ?

क्रोधित होकर इसने आज,
दिखलाया है कैसा तांडव रूप।
कभी वर्षा,कभी ओले,
कभी तो हिलती धरा अनूप।।

दूषित हुई है धरती सारी,
दूषित हुआ है पर्यावरण।
हुआ प्रदुषित गंगा का जल,
चढ़ रहा गंदगी का आवरण।।

पर आज कोरोना के आने से,
ठहर गया जब मानव जीवन।
मुस्काई है अब प्रकृति हमारी,
जन जीवों में भी हुआ संतुलन।।

दिखने लगी है हरियाली अब,
दूर गया है आज प्रदूषण।
सड़कों पर वनराज घूमते,
शहरों में नाच रहे गण मोर।

स्थिर हुआ है सागर का जल,
तट पर बैठी आज मछलियाँ।
हो निर्भीक स्वछन्द भाव से,
बैठी करती वे अठखेलियाँ।।

पर इतना ही सम्पूर्ण नहीं है,
अभी बहुत कुछ करना है।
आज बचाने पर्यावरण को,
संकल्प हमें कुछ लेना है।।

रखनी होगी साफ सफाई,
करना होगा हरीतिमा संवर्धन।
कारखानों के अवशिष्टों का,
करना होगा दूर गमन।।

यदि नहीं रहेगी प्रकृति हमारी,
तब क्या हम रह पाएंगे?
यदि नहीं रहेंगे पशु, पक्षी, प्राणी,
तब क्या हम जी पाएंगे?

आओ करें संकल्प आज,
अपनी  प्रकृति बचाएंगे।
पर्यावरण की रक्षा करने,
हम सब मिल आगे आएंगे।
ममता श्रवण अग्रवाल (अपराजिता )

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