लघुकथा पंडुकी के अंडे

महाविद्यालय प्रांगण के वृक्ष और पौधे तथा एक कोने में स्थित छोटा-सा तालाब।
महाविद्यालय में अनगिनत पशु पंक्षियों का बसेरा बन चुका है। निर्भिक होकर विचरण करते हुए तीतर, मोर, पंडुकी, गौरैया, जल बत्तख, अनेक रंगों की छोटी-छोटी चिड़िया, खरगोश, शाही, इत्यादि महाविद्यालय के शांत और सुन्दर वातावरण के प्रत्यक्ष गवाह हैं।

हाँ, दो-तीन महिने में एक बार दो-तीन दिनों के लिए लंगूरों के एक झुंड का भी आगमन होता है। वे भी अपने उपद्रवी प्रवृत्ति का प्रदर्शन महाविद्यालय प्रांगण में बहुत कम करते हैं। शांति से गोल्डमुहर, अशोक, इक्विलिप्टस, कदम, पीपल, गुल्लर, शीशम के पेड़ों पर बैठे रहते हैं, पर आम, अमरूद, आँवला, जामुन और बेल के पेड़ों पर कभी-कभी उपद्रव जरूर करते हैं, जो कि उनका स्वाभाविक हक है।

आज महाविद्यालय के एक कुर्सी पर घोंसला बना कर एक पंडुकी ने अंडा दिया और पंडुकी का जोड़ा उस घोंसला को पूर्ण करने में पूरे दिन व्यस्त रहा, जो कि इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि इस महाविद्यालय के बच्चे, शिक्षक एवं शिक्षनेत्तर कर्मचारियो का प्रकृति से विशेष लगाव है महाविद्यालय का वातावरण स्वच्छ, सुन्दर और शांतिपूर्ण है।
@ स्नेहा रॉय, अयोध्या

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