आजकल

आजकल

देख अब बदल रहा है
युग आजकल
विष बन रहा है माँ का
दूध आजकल।।

मान भी रिश्तों का अब
रहा नहीं कहीं।
इन्सानियत का मिट रहा
वजूद आजकल ।।

चाहता न देखना किसी को
अब कोई।
बदल रहा समाज का भी
रूप आजकल।।

छाँव मे रहना नही अब
चाहता कोई।
लगती है भली सभी को
धूप आजकल।।

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देख अत्याचार बंद है
सभी आँखें।
बंद है जुबाँ सभी हैं
चूप आजकल ।।

जो अहिंसा का पढ़ाते
पाठ थे कभी।
बन चुके अब वो अशांति
दूत आजकल।।

जो सच्चा इन्सान है,सब
दोष उसी पर।
बिक रहा पैसों से हर
सबूत आजकल।।

न संतुष्टी है कहीं थोड़े
से किसी को।
चाहते पाना कुछ भी
बहुत आजकल ।।

रंग देख दुनिया का टूटता
अब हौसला।
मिल नहीं रहे कहीं पर
बुद्ध आजकल।।

कवि- प्रेमशंकर प्रेमी (रियासत पवई)औरंगाबाद

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