मानव जीवन _सुंदरी अहिरवार

मानव जीवन
मानव जीवन का भौतिक सत्य दो पहलुओं पर निर्भर है।
यादि मानव जीवन में अभी दुःख है । तो वह जीवनपर्यंत नही रहता ,
दुःख के बाद ही सुख आता है।
यादि सुख है तो , वो भी जीवनपर्यंत नही रहता ,
मनुष्य का जीवन परिवर्तन शील है।
सुंदरी अहिरवार की लघुकथा अहंकार को पढ़ने टच करे
महात्मा बुद्ध ने अपने शिष्यों से कहा तुम मानव जीवन की कल्पना इन बच्चों की इस क्रीड़ा से कर सकते हो
क्योंकि तुम्हारे बनाये शहर , राजधानियां सब ऐसे ही रह जाती है।
और तुम्हें एक दिन यह सब छोड़कर जाना ही होता है तुम यहां जिन्दगी की भागदौड़ में सब भूल जाते हो ।
और खुद से कभी मिल ही नहीं पाते जबकि जाना तो सबका तय ही है। इसलिए , स्वयं को जानना एक परम सत्य है।
मानव जीवन के संबंध में विभिन्न प्रकार की भ्रांतियां दृष्टिगोचर होती है।
यह सत्य है कि तमाम लोग जीवन में धन, यश, सम्मान व प्रतिष्ठा आदि।
को सर्वोच्च स्थान देते हैं, लेकिन अंतिम समय में जब उनके ज्ञानचक्षु खुलते हैं,
तो उन्हें अनुभूति होती है तो पता चलता की इतना जीवन निकाल दिया हैं ।परन्तु कभी खुद के लिए वक्त नहीं निकाल पाए।

श्री मद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार करना है।
मनुष्य की आत्मा परम सत्य को जानने के बाद जीवन मुक्ति की अधिकारी हो जाती है ।
और मनुष्य इस संसार समुद्र से पूर्णतया मुक्त होकर पुनः संसार चक्र में नहीं फँसता।
उसी तरह समग्रता से जीकर सारे संसार के लिए निमित्त बनना ही मानव जीवन का मूल लक्ष्य है।
इस संसार में रहकर हरेक को पूर्णता से खुलकर, खिलकर, वह करना है ।
जो वह कर सकता है। किसी दूसरे की बराबरी कम से कम तब तक नहीं करनी है।
जब तक आप जीवन रूपी सागर में तैरना नहीं सीख जाते।
व्यक्ति की सुषुप्त शक्ति को जगाने के लिए आदर्श का तेज चाहिए।
मनुष्य अपनी शक्ति का पूरा उपयोग नहीं करता, यह अनुभव-सिद्ध बात है, और यह भी सत्य है कि कोई भी मनुष्य जितना समझता है, उसमें कहीं अधिक शक्ति होती है। मनुष्य के अंदर शक्ति का अक्षय भंडार है।

सुंदरी अहिरवार
भोपाल मध्यप्रदेश….

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