कर्म क्या है और कर्म कैसा होना चाहिए

कर्म ही भाग्य विधाता
कर्म क्या है और कर्म कैसा होना चाहिए ? हम जो करते हैं केवल वही हमारे कर्म नहीं होते बल्कि हम जो सोचते हैं या जो कहते हैं वो सब हमारे कर्म ही होते हैं। कहते हैं इस संसार को हम जो भी देते हैं वह किसी न किसी रूप में वापस हमारे पास ही आता है। इस प्रकार हमारा कर्म ही हमारा भाग्य तय करता है।
गीता के अनुसार जो कर्म निष्काम भाव से ईश्वर के लिए जाते हैं वे बंधन नहीं उत्पन्न करते। वे मोक्षरूप परमपद की प्राप्ति में सहायक होते हैं। इस प्रकार कर्मफल तथा आसक्ति से रहित होकर ईश्वर के लिए कर्म करना वास्तविक रूप से कर्मयोग है और इसका अनुसरण करने से मनुष्य को अभ्युदय तथा नि:श्रेयस की प्राप्ति होती है।
कर्म चार प्रकार के होते हैं।
मानव जीवन _सुंदरी अहिरवार

काम्य कर्म (किसी मकसद से किया हुआ कार्य)।
निश्काम्य कर्म (बिना किसी स्वार्थ के किया हुआ कार्य)।
संचित कर्म (प्रारब्ध से सहेजे हुए कर्म)। निषिद्ध कर्म (नहीं करने योग्य कर्म)।
कर्म का सिद्धांत यह कहता हैं कि _
धर्मग्रंथों के अनुसार मनुष्य को किए हुए शुभ या अशुभ कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। कर्म का सिद्धांत अत्यंत कठोर है। जहां अच्छे कर्म व्यक्ति के जीवन को प्रगति की दिशा में ले जाते हैं, वहीं बुरे कर्म उसे पतन की ओर ले जाते हैं। धर्मग्रंथों के अनुसार मनुष्य को किए हुए शुभ या अशुभ कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है।

अच्छे व बुरे दोनों प्रकार के कर्मों का फल मिलता है। यदि मानव अच्छे कर्म करता है तो वह इस जन्म के साथ अगले जन्म में भी सुख भोगेगा लेकिन बुरे कर्म करेगा और जीवों की हिंसा, दूसरों को परेशान करेगा तो उसे अगले भव में नरक या तिरमन्स गति मिलेगी।
अर्थात्
ईश्वर सर्वव्यापक व सर्वज्ञ है। वह जीवों के मन, वाणी और शरीर से किए जाने वाले सभी कर्मों को जानता है। उसे प्रत्यक्ष प्रमाणों की आवश्यकता नहीं है, वह स्वयं ही प्रत्यक्ष साक्षी है और जीवों को उनके कर्मों का फल केवल ईश्वर ही देता है।

वेद, उपनिषद और गीता- तीनों ही कर्म को कर्तव्य मानते हैं। यही पुरुषार्थ है, जो व्यक्ति भाग्य, ज्योतिष या भगवान भरोसे हैं उसको भी कर्म किए बगैर छुटकारा नहीं मिलता है !
धर्मशास्त्र और नीतिशास्त्रों में कहा गया है कि कर्म के बगैर गति नहीं।
जीवन का झरना_राजवर्धन
आपको अपनी गलतियों, कमजोरियों और परेशानियों का स्‍वयं विश्‍लेषण करना चाहिए। ये मुश्किल काम है लेकिन आपको ये जरूर करना चाहिए। जब तक आप अपने अंदर बदलाव नहीं लाएंगें तब तक आप बाहर भी कुछ नहीं बदल सकते हैं। अपने सत्‍कर्मों से ही आप कर्म के चक्र और बंधन से मुक्‍ति पा सकते हैं।
कर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं, महाभारत युद्ध में कृष्ण की गीता ने नहीं, लीला ने साबित की है।

सुंदरी अहिरवार
भोपाल मध्यप्रदेश

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