आज़म नैय्यर की पांच गजलें

🌹ग़ज़ल

ए ख़ुदा जीस्त में वो फ़िजां दें मुझे
प्यार की उम्रभर वो रवां दें मुझे
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जिंदगी के सपने पूरे कर दें सभी
और ए रब नहीं इंतिहा दें मुझे
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रख सलामत शाखें प्यार की रब सदा
प्यार की जीस्त में मत ख़िज़ां दें मुझे
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रब मुहब्बत जिसकी कम नहीं हो कभी
जीस्त में दिल का ऐसा जहां दें मुझे
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जीस्त भर रब नहीं फ़ासिला जो करे
हम सफ़र कोई ऐसा यहां दें मुझे
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नफ़रतों की नहीं वार बू कर सके
प्यार से रब भरा वो मकां दें मुझे
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वो लगा आज़म दामन में काटें भरने
प्यार का फ़ूल वो ही कहां दें मुझे
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🌹ग़ज़ल

जीस्त में कोई नहीं दिलदार है
कट रहा हर एक तन्हा यार है
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इसलिए लेता नहीं है फ़ूल वो
यार करता ही नहीं वो प्यार है
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इसलिए मुँह फ़ेर उसनें ही लिए
शायद उसको ही वफ़ा इंकार है
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देखते है प्यार करता कब क़बूल
प्यार उससे कर लिए इजहार है
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दिल हुआ जाये यें दीवाना उसका
नजरों से करता ऐसे वो वार है
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चूड़ियाँ कंगन करे वो कब क़बूल
आज भेजा प्यार का उपहार है
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वो न जाने फ़ोन सुनता क्यों नहीं
फ़ोन ही “आज़म” किया हर बार है
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🌹ग़ज़ल

मैं ऐसा हर ख़ुशी से ही निकला ग़रीब हूँ
इतना नहीं मगर जीस्त में ख़ुशनसीब हूँ

वो ही उतर आया दग़ाबाजी पे आज तो
सच्चा जिसे दिल से ख़ूब समझा हबीब हूँ

मेरी वफ़ा कहां मगर समझी उसी नें थी
कहता वही मुझे रोज़ मैं तो रक़ीब हूँ

टूटे दिल को करार दें दवा कोई ऐसी
वो रोज़ ढूंढ़ता गांव में ही तबीब हूँ

जो चाह वो कभी नहीं मिलता मुझे मगर
किस्मत से यार मैं बहुत ही बदनसीब हूँ

ग़म भी देती ख़ुशी ख़्वाब दिल में हसीन दें
तकदीर कह रही यही मुझसे अजीब हूँ

उतना हुआ उसी से “आज़म”मगर यहां
जिसके यहां बहुत यार दिल के क़रीब हूँ
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मिली मुझको नहीं है जिंदगी में ही ख़ुशी आज़म
उदासी से भरी है जिंदगी मेरी बड़ी आज़म

नहीं कोई यहां तो दोस्त है इस गांव में अपना
अकेले ही यहां तो जिंदगी बस कट रही आज़म

निभाया साथ मेरा तो किसी ने भी नहीं था सच
निभा बस साथ मेरा शाइरी देखो रही आज़म

दवाई मैं खरीद पाया नहीं हूँ बीमारी की ही
रही है जिंदगी में यहां तो मुफ़लिसी आज़म

नहीं मेरा बना है हम सफ़र वो जिंदगी का ही
लगी दिल को बहुत जिसकी यहां तो बेकली आज़म

ख़ुशी के जल गये है धूप में ही फ़ूल नफ़रत की
मुहब्बत की नहीं बरसी है मुझपे शबनमी आज़म

सकूं के पल न जी पाया ख़ुशी के ही अभी भी मैं
भरी हर पल रही है जिंदगी अनमनी आज़म

नज़र आया नहीं है दूर तक मुझको वही चेहरा
उसे मैं देख आया आज सारी ही गली आज़म
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परेशाँ ही इसलिए ये दिमाग़ है मेरा
ख़ुशी के पल जिंदगी सें फराग़ है मेरा

भुलानें को कैसे पीऊं शराब ए यारों
कहीं खोया देखिए वो अयाग़ है मेरा

अंधेरे है ग़म भरे ही नसीब में शायद
ख़ुशी का ही बुझ गया वो चराग़ है मेरा

भूखे ही अब पेट सोना पड़ेगा मुझको फ़िर
चूल्हे पे ही जल गया देखो साग़ है मेरा

उल्फ़त की कैसे बढ़ेगी कहानी ये आगे
नहीं आया सुनने को यार राग़ है मेरा

कभी नहीं जो मिटेगा मिटाने से भी ये
लगा ऐसा दामन पे ही जो दाग़ है मेरा

उजड़ गया है सदा के लिए ही ए आज़म
हरा भरा प्यार का था जो बाग़ है मेरा

आज़म नैय्यर
(सहारनपुर उत्तर प्रदेश)

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