एक थी पानो

एक थी पानो
माघ का महीना उत्तरार्ध पर था । शुक्ल पक्ष की नौवीं तिथि लग चुकी थी। दिन अब बढ़ने लगे थे और धूप खिल कर निकलने से रवि की फसलें लहलहा उठी थी। दो बहनों और दो भाईयों में सबसे बड़ी पानो अब तेरह की हो चुकी थी। तीखे नैन-नक्श,दूधिया रंग छरहरी देहयष्टि गृहकार्य दक्ष पानो गांव भर की चहेती थी ।हवाओं में फगुनहट की आहट थी चने और धनिए की महक से बधार तारी थे। आज पानो को सखियों के साथ पोखरा में नहाने जाना था।
धंटे भर में सारी सखियां पोखरा मे पहुंच जल किल्लोल करने लगीं। नहाने के बाद जब वे पानी के बाहर आयीं तो ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो दसियों जलपरियाॅं पोखरे के अआरे पर आ खड़ी हों, सबके बालों से पानी टपक रहे थे और गीले कपड़े में कांपती हुई आरे पर खड़ी वे सब सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति लग रही थीं पानी के साथ -साथ मानो रुप टपक रहा था ।थोड़ी देर बाद वे सब अपने – अपने घरों
के लिए चल पड़ी। दरवाजे पर पहुंचते ही पानो ने देखा कि ड्योढ़ी में बिछी चौकी पर बाबा , चाचा
और गाॅंव के कुछ रिश्तेदार लड़के को लेकर बातचीत कर रहे हैं। सब एकमत हो कह रहे थे कि लड़का बहुत अच्छा है। खेती-बाड़ी भी अच्छी है, पानो राज करेगी । इतना सुनते ही पानो आंगन में चली गयी। अन्दर प्रवेश करते ही पानो
ने देखा कि मां दरवाजे के ओट में खड़ी उन सभी लोगों की बातें बड़े गौर से सुन रही है । पानो मां के बगल में जाकर खड़ी हो गई । कुछ आहट होने पर मां ने पलट कर देखा तो पानो को अपने से भींच प्यार से चूम लिया, मानों आज ही पानो को बिदा कर रही हो। फिर थोड़ी देर के बाद जब सब लोग ड्योढ़ी से उठ कर चले गये तो पानो के पिता अन्दर दाखिल हुए, और पत्नी से बोले रिश्ता पक्का हो गया। सबसे पहले मुंह मीठा कराओ क्योंकि मैं चाहता हूं कि शिवरात्रि के दिन छेंका (रोका) दे आऊं। आंगन में खटिया पर बैठते हुए उन्होंने कहा । पानो की मां मिस्री की डली तस्तरी में रख उनकी तरफ बढ़ाते हुए स्वयं वहीं पास में पीढा लेकर बैठ गयी।सारा कुछ तय हो गया दान दहेज भी बहुत नहीं है बड़े भले लोग मालूम पड़ते हैं बैसाख तक ब्याह हो
जाए तो अच्छा रहेगा ,क्योंकि फिर काफी गर्मी हो जाएगी। सिर्फ एक महीने की बात है तैयारी करते बीत जायेगा। तय कार्यक्रम के अनुसार छेंका और विवाह
बड़ी धूमधाम से सम्पन्न हो गया। देखते
देखते पांच बरस बीत गये अब तक पानो
दो बच्चों की मां बन चुकी थी। तीसरी
बार जब गर्भवती हुईं तो आराम के लिहाज से मायके में आ गयी, क्योंकि ससुराल में दो बच्चे और फिर तीसरी बार पानो का मां बनना सेवा शुश्रुषा में कोई
कभी ना रहे इसलिए पानो के पिता जाकर पानो को‌ लिवा लाए। सब कुछ हंसी-खुशी बीत रहा था। मायके आ जाने से पानो को थोड़ा आराम मिला।
अब बच्चों को सम्हालने की जिम्मेवारी मां और बहनों की थी । पानो खुश थी। लेकिन किसी को क्या मालूम कि जल्द ही पानो की खुशियों को ग्रहण लगने
वाली है । गमों के भी हजार रंग और रास्ते हैं। हुआ यूं कि पानो दरवाजे पर बैठी धूप सेंक रही थी‌ । गर्भावस्था की बोझिल देह उसे बड़ा आराम मिल रहा
था और उसकी ऑंख मुदने लगी थी कि इतने में कहीं से एक औघड़ आया और बोला—-बेटी! पानो चौंक कर उठ बैठी और पूछा क्या हुआ बाबा अभी
आपके लिए भिक्षा लाती हूं। औघड़ एकटक पानो को देखे जा रहा था फिर गंभीर वाणी में बोला अनर्थ घोर अनर्थ।क्या हुआ बाबा और वह थोड़ी डर गयी ।क्योंकि औघढ देखने में भी डरावना था।ऐसा प्रतीत हो रहा मानो वह खुद काल था या फिर कालदूत। बेहिचक उसने ऐसी बात कह दी कि पानो के पैरों तले जमीन खिसक गई, पैर‌ थरथराने लगे और वह वहीं धम्म से बैठ गयी। औघड़ फिर बोला तुम्हें पुत्ररत्न की प्राप्ति होगी और चंद घंटों के अन्तराल पर पुत्र या पति में से किसी एक को खोना पड़ेगा। पानो की समझ में कुछ नहीं आ
रहा था उसे गश आ गया और समय से पहले ही प्रसव पीड़ा शुरु हो गई ।रात11•30 में उसे बेटा हुआ । सुन्दर चाॅंद जैसा। पानो बेसुध थी सुबह होते ही घर में सोहर गूंजने लगा । छोटी बहन नेग की
फरमाईस करने लगी। औघड़ की बात घर में किसी और को मालूम नहीं थी। पानो को धीरे धीरे होश आ रहा था ।होश होते ही उसका मन फिर से औघड़ की बातों से घबराने लगा। वह अन्यमस्यक भाव से लेटी रही। शाम को किसी तरह सिर्फ चाय व बिस्किट लिया वह भी बहन की बहुत जिद के बाद। किसी को कुछ बताया नहीं नाहक ही किसी को परेशान करना नहीं
चाहती थी लेकिन औघड़ की बात भूल भी नहीं पा रही थी। दूसरे दिन ऑंगन में सौर स्नान का कार्यक्रम चल रहा था।ढोल की थाप पर गीत और सोहर गूंज रहे थे।
गांव की महिलाएं एक दूसरे से हंसी ठिठोली कर रही थीं। और ओसारे में चारपाई पर घर के सारे मर्द आसन जमाए हुए थे कि पानो के ससुराल से नाई आया
सबने सोचा पुत्र जन्म की खुशी में आया है। नाई आया और प्रणाम कर एक तरफ़ गंभीर भाव से खड़ा हो गया। चेहरे पर दुःख और असमंजस का भाव स्पष्ट दिख
रहा था। पानो के पिता कुछ सशंकित हुए और पूछा क्या बात है बलदेव सब कुशल तो है न। बलदेव उन्हें अपने साथ आने का इशारा किया,जब वे दोनों भीड़
से थोड़े अलग हुए तो बलदेव की बात सुनकर उनपर जैसे वज्रपात हुआ। सिर घूम गया।आवाज रुंध गयी किसी तरह खुद को संभाला और घर में दाखिल हुए।
पत्नी उनका उतरा चेहरा देखकर सहम गयी । क्या हुआ इतनी खुशी के मौके पर ऐसा चेहरा नजदीक आते हुए पत्नी पूछी तबियत तो ठीक है न? इतने में पानो दरवाजे पर आ खड़ी हुई मन बुरी आशंका
से भर उठा। उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा हां ठीक है किन्तु यह गाना बजाना बंद करो। सबसे कहो अपने अपने घर जाएं। पानो की मां समझ गयी कुछ गड़बड़ है। अब तो पानो की मां जिद कर बैठी । दृढ़ता से बोली क्या हुआ सच सच बताओ वह खुद को सम्भाल नहीं पाए और सब कह दिया। खुशियां मातम में बदल गयी पानो सब कुछ सुन चुकी थी वह बदहवास पागलों की भाॅंति भागने लगी ,मानो पैदल ही ससुराल अपने पति के पास पहुंच जाएगी। कुछ लोग उसके पीछे उसे पकड़ने दौड़े और पकड़ कर घर ले आए। शाम होते होते सब पानो की ससुराल में
थे।पानो पछाड़ खाकर पति पर गिर पड़ी। सारे सगे संबंधी दोनों परिवारों को संभालने में लगे थे।घंटे भर बाद दाह संस्कार की तैयारी होने लगी।पानो के मां पिता वहीं बेटी के साथ रुक गये। सगे संबंधी सब नवजात को कोसने लगे।

महीनों बाद पानो आंगन में शून्य भाव से बैठी हुई थी । दोनों बच्चे वहीं आंगन में खेल रहे थे ।छोटा बेटा जो मात्र ढाई महीने का था । साथ में सोया हुआ था कि
मंझलें बेटे को भूख लग आई वह खाना मांगने लगा। जेठानी उठी और खाना न देकर कस कर एक चांटा लगा दिया। दिन भर भूख भूख करता है , कहाॅं से आएगा इतना और कौन परोसते रहेगा। बेटा माॅं के पास आकर सुबकने लगा।बड़ा बेटा भी सहम कर मां के पास आकर बैठ गया। दोनों बेटों को रोते देखकर और जिठानी के तेवर देख घर के पुराने वफादार नौकर से रहा नहीं गया वैसे भी उससे पानो की दशा देखी नहीं जाती थी।वह पानो के पास आकर बड़ी आत्मीयता और सहानुभूति से समझाने के गरज से बोला—मालकिन
हिम्मत रखिए और सम्भालिए अपने आपको।अब यही आपकी दुनियां है ।इन मासूम बच्चों के खातिर आपको उठना होगा। मालकिन! मालकिन! उसका स्वर
ऊंचा था। पानो हड़बड़ा उठी । बोला कुछ
नहीं शायद उसकी चेतना लौट आयी। अपने बच्चों को सीने से लगाकर खूब रोई। फिर उन्हें खाना दिया ।और शीघ्र ही घर के मुखिया यानि अपने जेठजी पास दालान में जा खड़ी हुई। पानो को हठात् अपने सामने देख जेठजी घबरा गये और सस्नेह पूछा क्या हुआ यहां क्यों
आयी ? फिर अपनी पत्नी को आवाज दी कि इसे लिवा ले जाओ। पत्नी आई और मुंह पर वितृष्णा का भाव लिए लौट गयी पानो को देखते ही उसका मूड बिगड़ गया। पानो भी जानेवाली नहीं थी और उसने बिना लाग-लपेट के कहा मुझे मेरा हिस्सा चाहिए। जेठजी अवाक् रह गये। क्या कहा हिस्सा तो खेतों को कौन जोतेगा ? खेतों पर कौन जाएगा कैसे करोगी तुम खेती-बाड़ी? अनुभवी जेठजी समझ चुके थे कि कोई बात इसे चुभ गयी है। अपनी पत्नी को वह अच्छी तरह से
जानते हैं जिसकी किसी से पटरी नहीं बैठती थी। इधर पानो भी जिद पर अड़ी हुई थी उसने फिर जोर देकर कहा मैं पूरे होशोहवास में हूं और अब जबकि मेरे पति नहीं रहे ,तो मैं जाऊंगी खेतों पर और मैं करूंगी खेती।
मैं अपने बेटों को खोना नहीं चाहती मैं इनकी परवरिश अच्छे से करना चाहती हूं।अतः आप मेरे हिस्से की जमीन देकर मुझ अभागिन पर कृपा करें। शेष मैं सब संभाल लूंगी।‌ अब मैं किसी पर बोझ बनना नहीं चाहती। जेठ जी उठे और दूसरे दिन पंचों के‌ सामने ज़मीन का बंटवारा हो गया। पानो अपने बच्चों और अपनी जमीन के साथ अलग हो गयी।घर का वफादार नौकर पानो के साथ था।
सुषमा सिंह
औरंगाबाद
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( सर्वाधिकार सुरक्षित एवं मौलिक)

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