मुस्कुराती रहे हिन्दी-अकेला की एक कविता

आज दिवस है जन गण की हिन्दी का,
मिलकर बढ़ायें हम सब इसका मान,
बढ़ती रहे जग में चहुँओर मेरी हिन्दी,
मुस्कुराती रहे हिन्दी,मुस्कुराये हिन्दुस्तान।
मुस्कुराती रहे हिन्दी…।

सुर,तुलसी,कबीर,खुशरो की यह भाषा,
रहीम,रसखान,जायसी की यह आशा,
लाल,बाल,पाल ने छिड़की इसमें जान,
हिन्दी से हो पुरे विश्व का कल्याण।
मुस्कुराती रहे हिन्दी…।

गाँधी, राजेन्द्र, पटेल ने सींचा है इसको,
विवेकानंद,अटल,रफी ने डाले इसमें प्राण,
महादेवी,शिवपुजन,निराला ने दी आहुति,
दिनकर,पंत नेपाली,लता ने बढ़ाई शान।
मुस्कुराती रहे हिन्दी…।

प्रेमचंद,द्विवेदी,बेनीपुरी का इसमें आन,
नीरज,प्रदीप,गुलजार ने किया सम्मान,
करेंगे हमसब हिन्दी की अनवरत सेवा,
कवि”अकेला”को है इस पर अभिमान।
मुस्कुराती रहे हिन्दी…।
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अरविन्द अकेला

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