प्रीतम कुमार झा की रचना अनोखी चाहत

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**अनोखी चाहत**

देख-देख प्यारी दुनियां को,
कब तक यूं ललचाऊं मैं।
मन के आंगन मंजर छाये
भंवरा बन उड़ जाऊं मैं ।
आंगन वो हैं आने वाले,
समझ न आये करूं मैं क्या,
मन होता है फूल बनूं और
खुद को आज बिछाऊं मैं ।

उनसे हीं तो रातें मेरी,
दिन भी उनसे निकला है।
केवल उनकी एक छुअन से,
मुझसा पत्थर पिघला है।
नींद भी मेरी शायद सोयी,
सपने पाले आंखों में ।
गाल हुये हैं सुर्ख गुलाबी,
मन हीं मन शरमाऊं मैं ।

चाहत उनसे हुयी जवां है,
पंख लगे अरमानों में ।
अब तो छायी हरियाली है,
हर गुलशन-विरानों में।
रोम-रोम में बसे हैं ऐसे,
जैसे उर में प्राण बसे।
ऐसा मुझसा कौन भला है,
खुद पर अब इतराऊं मैं ।

मैं हीं मीरा, मैं हीं तुलसी,
मैं हीं सूर-कबीर हूँ।
बंधन उनसे बंधी है ऐसी,
प्यार भरी जंजीर हूँ ।
तोड़े से भी टूट न पाये,
गर्दिश की औकात है क्या ।
मन तो करता पल में जैसे,
आसमान चढ़ जाऊं मैं ।

प्रीत हमारी लगे जुदा है,
वो है ईश्वर वहीं खुदा है।
प्यार न जाने जाति मजहब,
दर्दे दिल की वहीं दवा है।
अब तो धड़कन उन्हें पुकारे,
जैसे चांद चकोर को।
प्रेम ग्रंथ में सबसे ऊपर,
अब तो नाम लिखाऊं मैं ।

—प्रीतम कुमार झा
अंतरराष्ट्रीय कवि, गीतकार सह शिक्षक
महुआ वैशाली बिहार ।🌹🌺👏🧡💚💙🌸❤️🌻🏵️🌹🌹

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