अरुण दिव्यांश की दस रचनाएं

चीन
चीन में उपजा एक चिन है ,
कहलाता है वह जो चनेठ ।
चीन का शक्ति बनने वाला ,
चीन हेतु ही बन गया है हेठ ।।
अन्दर से तो है वह चनोरी ,
दिखने में लगता वह चनार ।
विश्व हेतू जो बना है चिनक ,
अरि दिखता जिसे संसार ।।
नहीं जिसे है चीन की चिंता ,
वह चिंतन भी क्या करेगा ।
जिसका मन जो रहा न चंगा ,
वह वैश्विक दर्द कैसे हरेगा ।।
जा रहा जो वैश्विक चित्त से ,
नही किसी का भी मीत होगा ।
दौड़ रहा है जो बनकर चीता ,
वह स्वयं थककर चित होगा ।।
नहीं आ रहा है चीन को चैन ,
चीन की मंसा भी चुन होगा ।
मजबूर होगा जब भी भारत ,
भारत का एक ही जुनून होगा ।।
चलाना चाहे वैश्विक तानाशाही ,
मानव दल में बना असुर है ।
चीन का चाणुर कहे जानेवाला ,
कलियुगी दैत्य कहलानेवाला ,
अहं से भरा वह तो भरपूर है ।।

२गरीबों कै दीए में तेल नहीं

अमीरों से दोस्ती खेल नहीं ।
दोनों बीच गहरी खाई यारों ,
इसीलिए दोनों में मेल नहीं ।।
अमीरों का सदा होता बेल ,
गरीबों को सदा होता जेल ।
इन्सानों की नगरी में आकर ,
कुदरत भी हो जाता फेल ।।
कहते मायावी हैं रावण को ,
आज मायावी लाखों पड़े हैं ।
गरीब विभीषण मारने हेतु ,
लाखों रावण आज खड़े हैं ।।
कहने को गरीबी दोष नहीं ,
किंतु गरीबी तो महापाप है ।
अमीरी तो है अभिशापमुक्त ,
गरीबी बनता अभिशाप है ।।
अमीर केवल पैसे हैं चाहते ,
गरीब लाएँगे कहाँ से पैसे !
पैसे होते तो गरीबी न होती ,
अमीरी गरीबी में रिश्ते कैसे !!
गरीबों की गरीबी बदतर होती ,
बदतर जीवन होता बदहाल ।
गरीबों की गरीबी वह न समझे ,
धन दौलत से होता मालामाल ।।

३दिल के आईने में तुम

क्या मानव में जन्म लिए हो ,
देख लो दिल के आईने में तुम ।
संभलकर देखना आईने को ,
आईने में ही न हो जाना गुम ।।
यों तो दिख रहे मानव ही तुम ,
क्या अंदर है मानवता तुम्हारी ।
क्या प्यारे हैं तुम्हें सब कोई ,
क्या प्यारे बनने को है बेकरारी?
संभलकर रहना प्यारे बनने हेतु ,
इसके लिए कुछ लोग लेते पैसे ।
कैसी है मानवता यह उनकी ,
रिश्ते रहेंगे उनसे हमारे कैसे ?
निज बुराई तुम पहले देख लो ,
पर बुराई तुम देख लेना बाद में ।
पर बुराई से भी तुम सीख लो ,
आजीवन रहोगे तुम आबाद में ।।
पर दिल की तुम देखो विशेषता ,
ढाल लो तुम उसे निज दिल में ।
पर दिल की मत झाँको बुराई ,
जीवन होगा आजीवन गिल में ।।

४ अंतर्दीप

अंतर्दीप जलाकर देखो
अँधेरे में उजाला मिलेगा ।
मृदुल वाणी अपनाकर देखो ,
अमृत का ही प्याला मिलेगा ।।
पर हृदय खिलाकर देखो ,
अपना हृदय गगन खिलेगा ।
अंतर्दीप जलाकर देखो ,
अँधेरे में उजाला मिलेगा ।।
प्यार भरी नजरों से देखो ,
राजा का सिंहासन हिलेगा ।
चेहरे पर हो मधुर मुस्कानें ,
जीवन भी यह लंबा चलेगा ।।
दैहिक श्रम अपनाकर देखो ,
तन मन भी स्वस्थ पलेगा ।
अंतर्दीप जलाकर देखो ,
अँधेरे में उजाला मिलेगा ।।
विनम्रता को अपनाकर देखो ,
हृदय में भी वास करेगा ।
पर पीड़ा को हरकर दखो ,
तेरा पीड़ा भगवान हरेगा ।।
ऊँच नीच भेद भूलकर देखो ,
गरीबों में भगवान बनेगा ।
अंतर्दीप जलाकर देखो ,
अँधेरे में उजाला मिलेगा ।।

५ हमारा हिन्दुस्तान

सुन्दर है हमारा यह हिन्दुस्तान ,
संस्कृति व भाषाओं की खान ।
ऋषि मुनि देव जहाँ अवतरित ,
भारत को जहाँ दिए हैं वरदान ।।
नहीं हिंसा की प्रवृति है हमारी ,
नहीं किसी से युद्ध का अरमान ।
किन्तु किसी ने उंगली ये उठाई ,
उसके लिए होते हैं वज्र चट्टान ।।
मित्रता का हाथ बढ़ाया हमने ,
मित्रता का हाथ सदा बढ़ाएँगे ।
चाहे कोई गलत लाभ उठाना ,
उनको धूल शीघ्र हम चटाएँगे ।।
सभ्यता संस्कृति पूजा है हमने ,
सभ्यता संस्कृति का मान यहाँ ।
मर्यादित होकर मर्यादा ही चाहें
मर्यादित सभ्यता ही शान यहाँ ।।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम का देश ,
मर्यादा में रहना हमने सीखा है ।
देश धर्म पर ही बलि बलि जाएँ ,
मस्तिष्क में अपने ही लिखा है ।।

६ परछाईं

जीवन का तो भरोसा नहीं कोई ,
परछाईं का भरोसा क्या करना ।
जीवन तो मरता केवल एक बार ,
परछाईं का तो बार बार मरना ।।
चलते जब सूर्य चाँद के विपरीत ,
परछाईं भी हमारे समक्ष होता है ।
चलते जब सूर्य चाँद के तरफ ,
तब परछाई भी विपक्ष होता है ।।
सूर्य चाँद जब है सिर पर होता ,
तब हमारी औकात् बताता है ।
स्वयं हम बनते जितने भी बड़े ,
किन्तु परछाईं छोटा दिखाता है ।।
जीवन तो छोड़ता एक बार हमें
परछाईं हमें बार बार छोड़ता है ।
कभी आगे पीछे होता है संग में ,
कभी सूर्य चाँद संग मुँह मोड़ता है ।।

७ जीवन एक संघर्ष

जीवन यह अमूल्य है ,
जीवन तो बहुमूल्य है ।
समय का होता मूल्य ,
जीवन का नहीं मूल्य है ।।
जीवन का है क्या कहना ,
जीवन तो एक अर्श है ।
समय का मार हो जीवन पे ,
तो जीवन बनता कर्श है ।।
जीवन भरा हो आकर्ष से ,
कहाँ से आवे यह उत्कर्ष ।
जीवन बीतता तर्ष बनकर ,
जीवन में मिलता बहु धर्ष ।।
जीवन को ही नर्स बना लें ,
तो जीवन हो जाएगा कर्ष ।
जीवन जिएँ फर्श पे रहकर ,
जीवन होगा स्वयं में दर्श ।।
जीवन में ही मर्ष अपना लें ,
दुःख सुख में जिएँ सहर्ष ।
पल पल मिल वर्ष हैं बीतते ,
स्वयं में जीवन एक संघर्ष ।।

८ बाल दिवस

14 नवंबर , 2022
दिवसः सोमवार
हम बच्चे चाचा नेहरू के तारे ,
नेहरू चाचा भी प्रिय हैं हमारे ।
माँ भारती को आजाद कराके ,
माँ भारती का वे भाग्य सँवारे ।।
भारत माँ के तुम थे राजदुलारे ,
नहीं थके थे कभी नहीं तुम हारे ।
बापू गाँधी के तुम संगी साथी ,
बापू गाँधी के समझते इशारे ।।
माँ भारती के दर्द को भाँपकर ,
बेड़ी काटने का संकल्प लिया ।
बापू संग आन्दोलन में कूदकर ,
बापू को भरपूर सहयोग दिया ।।
भारत के थे बहुमूल्य जवाहर ,
भारतीय जवाहर तुम लाल थे ।
माँ भारती से रखे थे सुन्दर नेह ,
अरियों के अरि तुम तो काल थे ।।

९ वायु प्रदूषण से निजात

चल रहा गीत यह वायु प्रदूषण ,
गा रहे जन जन इसके ही गीत ।
हर कोई हुआ स्वार्थ से ग्रसित ,
प्रदूषण के बना हर कोई मीत ।।
भूल चूके हैं निज स्वास्थ्य को ,
धन संग्रह केवल उद्देश्य बना है ।
जन जन हुए हैं रोगों से ग्रसित ,
सीना ताने आज रोग तना है ।।
बुजूर्ग तो हैं मौत के ही बाट में ,
युवा जबरन निश्चिन्त खड़ा है ।
बच्चे भी नहीं हैं रोगों से वंचित ,
बच्चों में रग रग रोग भरा है ।।
जबतक हटेगा न स्वार्थसिद्धि ,
रूक नहीं सकता है वृक्षकर्तन ।
बढ़ते रहेंगे बस यूँ ही बीमारी ,
रोग करते रहेंगे बस यूँ नर्तन ।।
वृक्ष भी कहाँ पर कितने लगेंगे ,
जमीन आज उतना ही सीमित ।
सबके मन में आज राज छुपा है ,
कोई नहीं शुद्ध मन के निमित ।।
रूक जाए आज यह वृक्षकर्तन ,
कल से फिर हम आबाद होंगे ।
नहीं रूका यदि यह कुयोजना ,
बर्बाद रहे हैं और बर्बाद होंगे ।।
आज यह बीत रहा है हम पर ,
कल वंशज पर भी यह बीतेगा ।
रोग ग्रसित आयु क्षीण करके ,
मौत शीघ्र हमें भी वह जीतेगा ।।

१० मुस्कुराहट

हृदय जब है यह खुश होता ,
मुखड़े पे मुस्कुराहट आती है ।
हर कुछ है तब सुन्दर दिखते ,
हर दृश्य तब मनोरम भाती है ।।
मुस्कुराहट जीवन प्रदान करती ,
मुस्कुराहट आयु वृद्धि में प्रवीण ।
मुस्कुराहट से दशा दिशा सुधरे ,
मुस्कुराहट बिन आयु भी क्षीण ।।
उदासी छाती जब भी चेहरे पर ,
मुस्कुराहट कभी आ नहीं पाती ।
सुन्दर सपने भी अधूरी लगती ,
तब मन को कुछ भी नहीं भाती ।।
जीवन को जीना है यदि सुख से ,
हँसना खेलना मुस्कुराना सीखो ।
जियो दिल खोलकर आजीवन ,
बैर खोकर हाथ मिलाना सीखो ।।

अरुण दिव्यांश
डुमरी अड्डा
छपरा ( सारण )
बिहार ।