नव चेतना-अरुण प्रताप सिंह भदौरिया ‘राज’

नव चेतना
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नव चेतना उर में जगे,
प्रेम की फसलें उगें.
एक नया प्रभात हो,
खुद पर ही विश्वास हो.

गले मिल सब चलें,
न किसी को हम छलें.
इंसानियत दिल में रहे,
खुशियों में जन जन पले.

राष्ट्र का उत्थान हो,
दुश्मनों का नाश हो.
अज्ञान का तिमिर मिटे,
शिक्षित सब समाज हो.

दहेज का नाश हों,
नशा मुक्त समाज हो.
नारी का सम्मान हो,
सभी में स्वाभिमान हो.
अरुण प्रताप सिंह भदौरिया ‘राज’

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