लघुकथा बहू भी बेटी के समान होती है

बहू भी बेटी के समान होती है
लघुकथा

श्यामा प्रसाद का इकलौता बेटा नवीन
पढ़ाई पूरी करने के बाद गाॅंव में ही पब्लिक स्कूल खोल बच्चों को पढ़ाने लगता है । फार्म हाऊस पहले से था
ही, जिसे श्यामा प्रसाद सम्हालते थे, लेकिन अब चूंकि उम्र बढ़ रही थी तो वह भी बेटे के जिम्मे कर, आराम से बुढापा काट रहे थे। मजबूत खेती-बाड़ी अतः इलाके के सम्पन्न और रसूखदार लोगों में शुमार थे। बेटे के लिए अच्छे अच्छे घरों से रिश्ते आ रहे थे। बहुत सोच
विचार के बाद श्यामा प्रसाद के कालेज के दोस्त विपीन बाबू की बेटी ,उच्च शिक्षिता क्षमा के साथ‌ नवीन की सगाईहो गयी। घर में उत्सव का माहौल था।क्षमा ब्याह कर ससुराल आ गयी। शहर की पली- बढी क्षमा गाॅंव के परिवेश में थोड़ा असहज महसूस करती। हर समय गाॅंव की बड़ी बूढ़ी औरतें आंगन में बैठी रहतीं और क्षमा के चाल – डाल
बात चीत, तौर – तरीके सब पर निगाह रखती और गाहे बगाहे दो चार शब्द उछाल देतीं। मसलन हमेशा चेहरा दीखाती है । घूंघट नहीं करती तो कभी ऊंचे स्वर में बात करती है। यह सब देख सुन इकलौती ननद ‌ जो कभी ससुराल जाती ही नहीं थी , को भाभी को सताने का मौका मिल जाता था। बेचारी क्षमा हर संभव कोशिश करती ठीक से रहने की किन्तु आॅचल सरक ही जाता। एक दिन गांव की कुछेक औरतें आंगन में बैठी आपस में बोल बतिया रही थी, तो क्षमा उनके लिए चाय बनाकर ले जाने लगी कि फिर उसका आंचल सिर से सरकने लगा अब एक हाथ से चाय की ट्रे पकड दूसरे हाथ से जब आंचल सम्हालने की कोशिश की तो अनबैलेंस होकर चाय की ट्रे गिर पड़ी।फिर क्या था सास नन्द को‌ मौका मिल गया , दोनों बरस पड़ी उस बेचारी पर। खूब‌ लानत मलामत हुई। किसी ने यह नहीं देखा कि गर्म चाय से कहीं उसके हाथ पैर तो नही जले। क्षमा चुपचाप टूटे कप बटोरने लगी। गांव वालियां भी बेशऊर और ना जाने क्या क्या जुमले उछाल चली गयीं।
टच कर पढ़िए गजल उसकी लिखते समय मेरे जज्बात बहकने लगते-सीताराम पवार
इतवार का दिन था नवीन घर‌ में था और सारा‌ कुछ देख सुन चुका था। जब सारी औरतें चली गयीं तो गुस्से में धड़धड़ाते हुए वह अपनी मां के पास गया और बोला- शादी से पहले तुम लोगों को पढ़ी लिखी सुंदर स्मार्ट बहू चाहिए थी और जब तुम्हारे मानक पर सही लड़की मिली तो उसे तुम लोगों ने आया बनाकर रखा हैं चुप रहने का मतलब यह तो नहीं कि तुम्हारा अत्याचार बढ़ता ही जाए।आज से क्षमा सूट पहनेंगी और घर के कामों में तुम दोनों हाथ बटाओगी। इतना कह नवीन क्षमा के हाथों में बरनाल लगाने लगा ।माॅं बेटी इस अप्रत्याशित व्यवहार से सकते में थीं। उन्होंने कभी सोचा भी न था कि नवीन जैसा मातृभक्त बेटा कभी बीबी का पक्ष लेकर माॅं को बोल भी सकता है।यह मानी हुई बात है कि सास व ननदे बहुओं को हमेशा दोयम दर्जे रखती हैं जिससे घर में विवाद बढ़ता है।इस वाकये के बाद मां बड़बड़ाने लगी और बहन बालकनी में बैठकर जोर जोर से रोने लगी। इतने में नवीन के पापा अपने दोस्त सिंह साहब के साथ घर में दाखिल हुए। उन्हें देखते ही बेटी और जोर – ‌जोर से रोने लगी। सारी स्थिति सेअवगत होने के बाद नवीन के‌ पापा तो कुछ नहीं बोले लेकिन सिंह साहब चुप न रह सके, नवीन की मां से मुखातिब होते हुए वो बोले ” देखिए हमारा इस घर में इतने दिनों से आना जाना है कि मैं भी
अब इस घर के सदस्य जैसा हो गया हूं।मेरी बात ध्यान से सुनिए – अगर आपकी बेटी नेहा के साथ ससुराल में ऐसा व्यवहार होगा त आपको कैसा लगेगा। अरे, बहू भी बेटी के समान होती है।इतनी सुघड़
बहू को भी आप भला बुरा कहते हैं इसलिए मजबूरन नवीन को आना पड़ा। घर के काम अगर सब मिलजुल कर करें तो इसमें बुरा क्या है? इससे तो प्रेम भाव भी बना रहेगा और बहू की नजरों में आपका सम्मान भी बढ़ेगा। इसलिए अगर सम्मान चाहती हैं तो बड़ा छोटा सभी को समझने की कोशिश कीजिए बस ।
सुषमा सिंह
औरंगाबाद
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(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं मौलिक)

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