बस तुम्ही हो बस तुम्ही हो -गोपाल

बस तुम्ही हो बस तुम्ही हो
World of writers

एक अनुभूति जिसकी अभिव्यक्ति
शब्दों की सीमा से हो परे, बस
उसका एहसास केवल हृदय में
उथल पुथल कर मचल मचल कर
सिर्फ होठों तक आकर फिर
प्रवाह बनकर शुन्य आकाश में
तैरकर,प्रफुल्लित कर हृदय को,
उल्लसित तरंगों सा हिचकोले देकर
तृण शय्या पर उकेरते घास की
फुनगियो के साथ नीरव शांत चित्त
जड़ता देने को आतुर अहसास
ही तो है प्रेम; जो हमारे हृदय में
जगाया है मचलते बहकते तुम्हारे
चंचल काली आंखों की चमक दमक से
उत्सर्जित प्रवामय स्नेह आकर्षण
मोहपास की स्वर्णिम श्रृंखलामेआबद्ध,
खोकर अपने स्वत्व को जाना है हमने
प्रेम को राधे! वह हृदय तल में
उत्सर्जित निर्वाध प्रवाह का आधार
कोई और नहीं बस तुम्ही तो हो,
पुरुष की प्रकृति बस तुम्ही हो राधे,
बस तुम्ही हो बस तुम्ही हो, राधे!
@ गोपाल मिश्र, सिवान
World of writers

2 thoughts on “बस तुम्ही हो बस तुम्ही हो -गोपाल”

Leave a Comment