नया वर्ष 2022-भावना शर्मा

हर साल कुछ ऐसा होता है कि थक जाती हूँ मैं
हर साल कुछ ऐसा होता है कि खिल जाती हूँ मैं
हर साल कुछ ऐसा होता है कि बिखर जाती हूँ मैं
हर साल कुछ ऐसा होता है कि सम्भल जाती हूँ मैं
कतरा कतरा समेट कर कुछ और निखर जाती हूँ मैं
ख्वाहिशों और सच्चाइयों के बीच झूलती सी जिंदगी
आरजू की राह में बारम्बार बन्दगी
यूं हौसलों की आंच पर कुछ और पकी हूँ मैं
मुकम्मल जिंदगी की चाह में फिर भी जुटी हूँ मैं
साल पर साल बीते पर हिम्मत यूं ही बाकी रहे
गर दौड़ है ये वक्त की तो मुस्कान यूं ही हावी रहे
कसौटियों पर कसने की जंग यूं ही जारी रहे
ए नया साल तू साल मेरा हमराही रहे।
भावना शर्मा,अजमेर ,राजस्थान
स्वरचित
सर्वाधिकार सुरक्षित

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