कविता_दरकार है

हार की दरकार है
जीत से मन ऊब गया है
हार की दरकार है।
वार करे पीठ पर जो
यार की दरकार है।।

बढ़ चुकाआतंक जग मे,
तंग आ चुका हूँ मै।
मिल रही नाकामियों के,
संग आ चुका हूँ मै।
दिल में है नफरत भरा,
न प्यार की दरकार है।
जीत से मन ऊब गया है,
हार की दरकार है।।

पढ़िए _बीबी मुझसे नाराज है

जो भला करे उसी पर,
हो रहा है वार अब।
बढ़ चली विपरीत दिशा मे,
युँ समय की धार अब।
है बूरा हालात,न अब,
सुधार की दरकार है।
जीत से मन ऊब चुका है,
हार की दरकार है।।

आ जाए सैलाब जो,
मचा दे हाहाकार अब।
नष्ट हो जाए धरा से,
बढ़ रहा विकार अब।
लेखनी मे भी यहाँ अब,
धार की दरकार है।
प्रेमशंकर सा यहाँ,
खुमार की दरकार है।
है भला पतझड़ ,नहीं
बहार की दरकार है।
जीत से मन ऊब चुका है,
हार की दरकार है।।

कवि–प्रेमशंकर प्रेमी(रियासत पवई)औरंगाबाद

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