इस साल फिर नया साल आयेगा-गोपाल लाल बुनकर ‘साहिल’

*इस साल फिर*
*नया साल आयेगा,*
*शुरू में तो*
*जोश-उमंग*
*सब नये होंगे*
*लेकिन फिर*
*थोड़े समय बाद ही*
*वही पुराने*
*सिलसिलों का दौर*
*एक बार फिर*
*नये साल में*
*शुरू हो जायेगा |*

*गोपाल लाल बुनकर ‘साहिल’*
*कवि*
*ढोढसर, जयपुर, राजस्थान*।

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