नव वर्ष संदेश-गोपाल मिश्र

नव वर्ष संदेश

रात आती है फिर जाती है
विभावशान के साथ दीवा आती है
प्रकृति ने बनाए नियम परिवर्तन के
साल आता है और बीत जाता है।

फिर एक नया साल आता है
प्रकृति का रूप रंग नहीं बदलता
पर हमारे हृदय में एक नया
उमंग का संचार कर जाता है।

जो आ रहा है नया साल
न हो ऑक्सीजन का अकाल
महामारी और मृत्यु से फिर
न हो कलंकित भारत का भाल।

जीवन के उमंग ही हैं नव वर्ष
करना पड़ता है इसके लिए संघर्ष
परिवर्तन का तभी तक है महत्व
जब इससे होता है हर तरफ उत्कर्ष।

बागो में फूल नए खिलते हैं
सजते हैं लाल पीले रंग बिरंगे
ये रंग यूं ही नहीं चमकते हैं
माली ने पसीनों से सीचे होते हैं।

जीवन में उमंग भी कुछ ऐसे ही
टिमटिमाते तारों की तरह खिलते हैं
जब सुख दुख की चक्की में पीसकर
श्रमजल से इन्हें हम सींचे होते हैं।

गोपाल मिश्र, सिवान

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