नव वर्ष का आनंद क्यों- रत्ना बापुली

*नव वर्ष का आनन्द क्यो* ?

सुन विगत वर्ष का रोदन,
उठ रहा है मन मे प्रश्न?
नव वर्ष के आगमन पर,
क्यो इतना आनन्द?

वैसे ही तो जीवन का
चक्र चलता रहता है,
वैसे ही दफ्तर व काम का
आना जाना होता रहता है ।

फिर क्यो किसलिए है,
नव वर्ष का अभिनन्दन ।
क्यो इतना उल्लास,
सर्वत्र अति बन्दन ।

परतंत्रता की धरा पर,
जिसका हुआ था जन्म ।
क्या नही है यह परतंत्रता की
स्मृति का पुनरावर्तन ।

नही नही !
मानव मन की रीति यही है,
आदर्श को ही अपनाना ।
शुभ गुणो को ग्रहण कर,
निज जीवन संवल बनाना ।

जीवन की सत् शिक्षा को,
ग्रहण करता वह यो,
चाहे वह सीख उसे,
मिले पशु से ही न क्यो?

नव वर्ष की शुभ बेला मे,
बदलती धरती की काया,
हरित हो जाती वसुधा,
रूपहली सी बन छाया ।

इस ऋतु मे ही तो,
गेहूँ, सरसो उगते है,
खेत फसलो से व घर,
अनाजो से भरे रहते हैं ।

पर इसके विपरीत बहु,
जेठ माह के आदि मे,
शुष्क रहता खेत सभी,
वर्षा की प्रतीक्षा मे ।

इसलिए ही जनवरी माह,
नूतन वर्ष का आरम्भ,
देता है मानव को नव,
भाव मधुर अति वंदन ।

इसलिए ही शायद यह
अन्तर्राष्ट्रीय माह जनवरी,
देता है नव वर्ष का संदेश,
रचता भाव सुनहरी ।

रत्ना बापुली
मौलिक रचना

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