फिर भी आई होली रे

होली गीत
कोई पिया परदेश से आए
कोई लगावे बोली रे
कहीं से कोई खत भी ना आए
फिर भी आई होली रे ।।

जाने के पल कह गए
घर होली में आऊंगा
अंग अंग में आते ही
जी भर रंग लगाऊंगा
लेकिन आए नहीं साजन
झूठी हो गई बोली रे ।
कहीं से कोई खत भी ना आया
फिर भी आई होली रे ।।।

जाती नहीं अब अंगराई
अंग अंग है टूट रहे
सपनों में आकर साजन
सपनों को ही लूट रहे
लूटो ना सपनों को मेरे
हूं भरी गुलाल की झोली रे ।
कहीं से कोई खत भी ना आए
फिर भी आई होली रे ।।।।

ना तरसाओ अब आ जाओ
छोड़ कर नौकरी ऐसी
तड़प रही है जान तुम्हारी
जल बिन मछली जैसी
जी करता खाकर सो जाऊं
पीस भांग की गोली रे।
कहीं से कोई खत भी ना आए
फिर भी आई होली रे।।।

@श्रीराम राय

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