सब मुस्काना-कार्तिकेय त्रिपाठी ‘राम’

नव वर्ष काव्य
2022
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सब मुस्काना
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हुआ प्रभात अब नए वर्ष का,
फिर हमको मुस्काना है,
रवि किरणों से अब अंतस का,
सारा तम हर जाना है, इस धरती पर भी जीवन का,
रंग नया एक भरना है, जहां असीमित खुशियों का,
बहता उच्छृंखल झरना है,
लेना देना इस दुनिया का,
दस्तूर बहुत पुराना है,
मन करता हो जब देने का,
फिर मौका नहीं गंवाना है,
अब सबको अपने कर्मों का,
मोल यहीं पर चुकाना है,
ऊपर नहीं है कुछ दुनिया का,
ये धरा ही सब का ठिकाना है,
भागदौड़ और जोड़-तोड़ का,
किस्सा बहुत पुराना है,
जीवन जी लो दुख और सुख का,
अब हमको मुस्काना है।
हुआ प्रभात अब….
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कार्तिकेय त्रिपाठी ‘राम’ गांधीनगर इंदौर

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