कविता चांद मुझे बहलाया

चांद मुझे बहलाया

काविता

आज भी मेरे लिए , आसमां में चांद आया
आज फिर देख उदास , मुझे चांद था बहलाया।।

अपनी रौशनी से चांद मुझे रोज रौशन करता
चांद से अपनापन पाके दिल मेरा था मुस्काया।।

जाना , समझा हमने भी अब इस ज़माने को
अपने तोड देते जब , तब सहारा बन हसाया पराया।।

रिश्तों के बंधनों में सुकून नहीं दर्द समाता
बेरंग से इन रिश्तों समय दे फिर था आजमाया।।

ये वही दिल है मेरा जहां बेपनाह मोहब्बत थी
आज इसी दिल को हमनें पत्थर दिल था बनाया।।

देखो सोचो तुम वीणा आज पत्थर दिल है कहलाती
ये वही वीणा है जिसने कभी तुम्हें था रूह में बसाया।।

आज भी मेरे लिए , आसमां में चांद आया
आज फिर देख उदास , मुझे चांद था बहलाया।।

वीना आडवाणी तन्वी
नागपुर , महाराष्ट्र
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