ख्वाब नव वर्ष का-मनजीत कौर

ख्वाब नव वर्ष का

नव वर्ष की प्रतीक्षा करें हम सब ऐसे
सुधारेंगे दुनिया को, बदल देंगे सब कुछ जैसे

उम्मीद क्रांति की, नई आशाएँ, नए सपने
लाए नव वर्ष, भूल, मग्न हो जाएँ पूर्व व्यवहार में अपने

देखूँ ख्वाब नव वर्ष का, प्रेम, विश्वास हो सब पर
न दे धोखा दूजे को, अन्याय करे न कोई किसी पर

दूर हो अज्ञान का अँधेरा, हो सम्मान सभी का
न हो अत्याचार अनाचार, न राज हो भेद भाव का

वाणी पर हो नियंत्रण, फैलाव हो सुख शांति का
कोई बेघर, बेकार न हो, आगमन हो नव वर्ष का

सदियों से धरा पर जीवन यूँ ही पनपा है
सुख दुख पहलू जीवन के, आते जाते रहते हैं

ख्वाबों का क्या, देखे जाते हैं, होते न स्वतः पूरे
जी जान लगाना पडता है, कुछ नहीं होता बातॊं से

अमल बिना न संभव, उत्तम है सोच बदलाव की
शुरुआत होती है स्वयं से, बदलना पडता है स्वयं भी

कुछ न रहेगा शेष, सिवा पछतावे के
जीवन यूँ ही बीत रहा, साथ गुजरते पल के

लगे रहे उत्सव में गर, किया न कुछ गर
हाथ न लगेगा कुछ, जब टूटेगी सांसो की डोर

शिकायतों से न बदलेगा, श्रम से ही संवरेगा
नव वर्ष में कुछ ठोस, कोशिश से ही बदलेगा

नव वर्ष आये और चले गये, धन दौलत के अम्बार लगाये
भोगते रहे भौतिक विकास, अपने मूल्यों को न सहेज पाये

मनजीत कौर
हुबली
कर्नाटक

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