कविता मैं और यादें

यादें kawita
शहर से निकल आये हो,
क्या मेरी यादों से निकल पाये हो,

भाषा आज भी मेरी बोलते,
क्या अपनी दिल की धड़कन पर काबू पाये हो।
मन घबरा जाता फ़िर मुस्कुरा जाता,
क्या बीमारी दे गये?
ये प्यार की आहट है क्या?
या पागलपन का नशा देगये।
खाली कमरे में तेरी यादें छा गई,
दोस्ती की ख़ुशी अब खिलखिलाति नहीं,
मेरा घर अब जगमगाता नहीं,
क्या जादू किया मेरे दिल पर
दर्द अब लफ़्ज़ों से कहती नहीं।
सब अपने है यहाँ
तुम्हारे सामने सब पराये होगये?
कोनसा नशा किया है तुमनें
क़लम कागज पर चलती नहीं है
घड़ी बढ़ती नहीं है
सुबह होती नहीं है

मैं क़लम हूँ

मैं क़लम हूँ,
मुझें कोरा पन्ना चाहिए चलने के लिऐ।

मेरा कोई रंग नहीं,
मैं हर रंग को लिखता हूँ।

मैं ख्याल नहीं,
सबके ख्याल लिखता हूँ।

मैं ख़्वाब नहीं
सबके ख़्वाब रचता हूं।

मैं उदास नहीं,
सबको उदासी में हसा देता हूँ।

मैं जो भी हूं,
बस पन्नों पर चलता हूँ।

प्रतिभा जैन
टीकमगढ़ मध्यप्रदेश

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