मेरे बचपन की एक सच्ची दास्ताँ

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(जब मैं गुम हो गया था)
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पहले अक्सर गाँव-घर की महिलाएँ झुंड बनाकर ट्रैक्टर वगैरह से कहीं यज्ञ या कोई धार्मिक अनुष्ठान आदि देखने जाया करती थी, क्योंकी उस समय गांव देहात के लिए ट्रेक्टर ही उपयुक्त और सस्ती सवारी हुआ करती थी और सुगमता से मिल भी जाती थी।
एक दिन की बात है ,मेरे गाँव से ,करीब दो किलोमीटर के आस-पास, की दूरी पर भरकुर नामक एक गाँव है,जो पवई पंचायत मे ही पड़ता है । उसी गाँव में नौ दिन वाला कोई यज्ञ चल रहा था ।मुहल्ले के औरतों के साथ मिलकर मेरी माँ भी यज्ञ देखने जाने का प्लान बनाई । सभी ने मिलकर एक ट्रेक्टर ठीक किया।मैं भी बहुत खुश था क्योंकि मै उस समय छोटा बच्चा था,माँ मुझे छोड़कर जा ही नहीं सकती थी।
मैं मुहल्ले के सभी बच्चों से कहता चल रहा था-अले छलोज(सरोज)लाकेछ(राकेश),दीपत(दीपक),हम माई के छाथे(साथे) यद (यज्ञ) देथे टलेकटल (ट्रेक्टर) से जाईत ही।

शाम को बनठन कर सभी औरतें एक जगह जमा हो गई । हम बच्चों को मोटरा के तरह टेलर मे फेंक दिया गया।हमलोग आगे-पीछे जगह लुटने के लिए आपस मे लड़ने लगे ।नीचे औरतें,फलनियाँ कहाँ रह गेलई तो चिलनिया अभी तक ना अलई ,कर रही थी।अन्त में शाम को जब सभी लोग टेलर मे ठसाठस भर गए तो ट्रेक्टर चल पड़ी । गड्ढा गुड्डी से भरे रास्ते पर हड़ास-हड़ास पटक रहा था औरते एक दूसरे पर गिरते हुए आह बाप ,आह बाप चिल्ला रही थी और हमें उछल – कूद करने में बड़ा मजा आ रहा था ,हमलोग तो जानबूझकर एक दूसरे पर गिरने का नाटक कर रहे थे ।आगे ड्राइवर के दोनो तरफ बैठे कुछ चाचा -भैया लोग आपस मे गपशप करते हुए हँस रहे थे । ट्रेक्टर धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी । हमारे कानों मे किसी विद्वान के प्रवचन की आवाज लाउडस्पीकर के जरिए पड़ने लगी थी,हमलोगों ने अनुमान लगाया कि जगह पर अब पहुँचने ही वाले हैं।
आखिर हमलोग वहाँ पहुँच ही गए
सभी लोग ट्रेक्टर से उतरकर हाथ पैर सीधा करने लगे,हमे हिदायत दिया गया कि इधर -उधर कहीं नही जाना है ,काफी भीड़ है सभी को साथ मे ही रहना है ।हमने भी सहमति मे सिर हिला दिया ।
सभी लोग जगह लेकर बैठ गए स्टेज पर फूलों की माला पहने दाढ़ीवाले बाबा प्रवचन दे रहे थे ,नीचे बड़े-बड़े समयानो में हजारों-हजार की संख्या में लोग बैठे हुए उनको सुन रहे थे।
मुझे बड़ा अनस बर रहा था ।मैने देखा कुछ लोग बादाम चबा रहे है तो कुछ ऊँघ रहे है ।मेरी माँ भी पता नही किसके पास मुझे बैठाकर हिदायत दे दी थी की यहाँ से कहीं हिलना नहीं है और खुद औरतों के झुंड मे कही जाकर बैठ गई,हो सकता है वो मेरे आस-पास ही कही बैठी हो जिसे मै नही देख पा रहा था ।वो मुझे गली – मुहल्ले के लोगों के पास सुरक्षित बैठाई होगी जिन्हे शायद मैं पहचान पा रहा था ।
बाबाजी का प्रवचन समाप्त हो चुका था ,अब रासलीला आरंभ होने का अनाउंस होने लगा तथा तबला और हारमोनियम की टून-टान सुनाई पड़ने लगी थी ।मैने देखा जो लोग समियाना के बाहर इधर- उधर घुम रहे थे ,अन्दर आने लगे ,सो रहे लोग उठकर बैठ गए। थोड़ी ही देर मे रासलीला आरंभ हो गया। हमने हाथों और पैरों मे लोहे की बेड़ियाँ लगे एक स्त्री-पुरुष को देखा ,तभी स्टेज की लाईट धीमी होती है और एक नवजात शिशु के रोने की आवाज सुनाई पड़ती है,स्टेज-लाईट तेज होती है और एक चट्टान जैसा विशाल शरीरवाला ,बड़ी-बड़ी मूँछों से युक्त गर्जन करते हुए एक व्यक्ति प्रवेश करता है ।उसके पीछे हथियार लिए कुछ सैनिक भी रहते हैं। मै उसे देखकर काफी डर गया ।उसने बेड़ियां पहने पति-पत्नी से कड़कती आवाज में बच्चे की माँग की ,जब उन्होने इन्कार किया तो बलपूर्वक बच्चा उनसे छीन लिया और अट्टहास करने लगा ।वे उसके पैर पकड़ गिड़गिड़ाते रहे और वह दैत्य उन्हें झटककर उस नवजात बच्चे को पटककर मार दिया ।मै यह दृश्य देखकर रोने लगा और अपनी माँ को ढूँढने के लिए अपने जगह से उठकर भीड़ मे माई-माई चिल्लाते ,रोते हुए स्टेज के पास ही पहुंच गया ।मुझे रोता देख किसी ने मुझे स्टेज पर पहुंचा दिया । मै वहाँ इस डर से और चिल्लाकर रोने लगा कि मुझे भी पटककर मार डाला जाएगा।
स्टेज एँकर ने मुझे अपनी गोद में लेकर अनाउंस करने लगा कि किसी का बच्चा गुम हो गया है आकर ले जाएँ ।
जब कहीं से कोई आवाज नहीं आई तो उसने कहा-कोई आवाज नहीं आ रही है,इसे हमलोग अपने साथ ले चलेंगे।उसकी बात को सुनते ही मै छटपटाते हुए उसके गोद से कूदने का प्रयास यह सोचकर करने लगा की मुझे ले जाकर ये लोग अवश्य जान से मार देंगे,ये सब बच्चों को पटककर मारनेवाले हैं।तभी मैने देखा भीड़ को चीरते हुए आगे आकर शत्रुघ्न भैया कह रहे थे की यह बच्चा मेरे घर का है,इसे मुझे सौंप दिजीए।शत्रुघ्न भैया को देखकर मेरी जान में जान आई क्योंकि मै उनको अच्छी तरह पहचानता था,उनका घर मेरे घर के सामने ही था।इधर मेरी माँ भी मुझे ढूँढते हुए रो रही थी।जब मै पहुँचा तो माँ मुझसे लिपटकर रोने और दुलारने लगी क्योंकि मै उसका सबसे छोटा और प्यारा बच्चा जो था। घर आने पर मुझे पता चला की मैं यज्ञ में गुम हो गया था ।

लेखक–प्रेमशंकर प्रेमी (रियासत पवई)औरंगाबाद

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