नया साल-जितेंद्र सैनी

*नया साल* ‌……

*आने को नया साल है*
चारो ओर धमाल है
जोश में उबाल है
बदली सबकी चाल है
उठता एक सवाल है
क्या हर कोई खुशहाल है?

किमतों मे उछाल है
फसल खस्ता हाल है
किसान हुआ निठाल है
कर्जे से बेहाल है
जीना हुआ मुहाल है
*कैसा ये नया साल है*

भ्रष्ट ने बुना जाल है
रोज हुआ मालामाल है
नेतागिरी एक टकसाल है
खुद मे एक कमाल हैं
ईमादर ही कगांल है
*क्या यही नया साल है?*

बदल रहा काल है
सोच में भाल है
बिखरी हुई लाल है
सब लगे जंजाल है
ये मंजर फिलहाल हैं
जिदंगी का यही जमाल है
*जीवन हर पल नया साल है।*

*जितेन्द्र कुमार सैनी*
✍️✍️✍️
जयपुर ( राजस्थान)

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