कविता आत्मविश्वास संघर्ष से शीर्ष तक

कविता
“आत्मविश्वास”

“संघर्ष से शीर्ष तक”

दिव्य तुम ही
ज्वाला तुम ही
महज निर्णय तुम्हें करना।
संघर्ष से शीर्ष तक
तुम्हें पहुंचना।
सच भी तुम ही हो
झूठ भी तुम ही हो
एक निर्णय तुम्हें लेना।
संघर्ष से शीर्ष तक
तुम्हें पहुंचना।
अचल पर्वत से
धरा तक क्यों देखता
सिर उठा कर।
उठ और अपने कदम
बढ़ा तुम्हें निष्कर्ष निकालना।
संघर्ष से शीर्ष तक
तुम्हें पहुंचना।
प्रारंभ तुम ही हो
अंत भी तुम ही हो
एक निश्चित तुम्हें करना।
संघर्ष से शीर्ष
तक तुम्हें पहुंचना।
उपवन में खिलते फूल
निर्झर कलियों सी
मुस्कान छिपी है।
उन्हे देखकर
मुस्कुराना जरूर है।
संघर्ष से शीर्ष तक
पहुंचना जरूर है।

सुंदरी अहिरवार
भोपाल मध्यप्रदेश
8982936339

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