लघुकथा-सम्मान-यथार्थ जीवन

सौम्य की मां का देहांत हुए अभी महीना भी नहीं गुजरा था। सारे रिश्तेदार जा चुके थे।घर में रह गए सिर्फ सौम्य और उसके सेवानिवृत्त पिताजी।
घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी, सौम्य भी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता था। पिता जी को नौकरों के हाथ का खाना पसंद नहीं था इसलिए वे खाना स्वयं ही बनाते थे। सौम्य ने कई बार कहा-“पापा,इस उम्र में क्यूं इतनी मेहनत करते हैं,हम खाना बाहर किसी अच्छे होटल से भी तो मंगा सकते हैं ना।”
इस पर पिता हल्की सी मुस्कान के साथ बोलते–” बेटे, जो बात मेहनत और ईमानदारी से खाना बनाकर खाने में है ना,वो बात होटल के खाने में कहां ? पैसों से भले हीं हम सारी चीज़ें खरीदने की ताकत रखते हो,पर जो मजा मेहनत और ईमानदारी से किए गए कार्य में है ,वह किसी बात में नहीं है।”
पिता की बात सौम्य के पल्ले नहीं पड़ती,सो वह चुप हो जाता था।
अचानक कुछ दिनों के लिए पिता जी अपनी बहन के यहां चले गए‌‌। पन्द्रह दिन बाद वापस लौटें तो घर में ताला लगा देख पड़ोसी के यहां गए, पड़ोसी ने बताया कि सौम्य पिछले तीन दिनों से हास्पिटल में एडमिट है। कारण उन्हें भी नहीं पता था।
पिता हैरान परेशान हास्पिटल पहुंचे।बेटे को बिस्तर पर सकुशल देख उनकी जान में जान आई।
“बेटे,तुम यहां अस्पताल में क्यूं और किसलिए भर्ती हो”? पिता ने सिर पर हाथ रख प्रेम से पूछा।
“एम सॉरी पापा,आई एम सॉरी पापा।
आप सही थे और मैं गलत था। मेहनत और ईमानदारी से किए गए काम में ही अपनी भलाई होती है, हमेशा पैसों के दम पर कुछ पाने की इच्छा करने वालों की हालत मेरी तरह हो जाती है।
पिछले कुछ दिनों से मै सुबह-शाम होटल में खाना खाता था,जो महंगा होने के साथ ही स्वादिष्ट भी होता था और उसी महंगे, स्वादिष्ट भोजन का सेवन करने से ही फूड पाइजनिंग की शिकायत की वजह से अस्पताल में भर्ती हूं‌।’ रोते हुए सौम्य ने कहा।
पिता ने सौम्य को धीरज बंधाते हुए कहा–“यह तो अच्छी बात है बेटे कि तुम्हें मेरी बात समझ में आ गई। सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते। अपनी इस गलती से शिक्षा लो कि जीवन में हमेशा मेहनत द्वारा प्राप्त चीज ही ग्रहण करोगे। आजकल तो बहुत से लोग स्कूल कालेजों की डिग्रियां भी पैसों से खरीद लेते हैं‌। जो कि सरासर ग़लत है।जो अयोग्य है मगर पैसे वाले है, वे ही फर्जी तरीके से डिग्री हासिल करके ऊंचे पद पर आसीन हो जाते हैं।पर जो योग्य है, कुछ करने की क्षमता रखते हैं, वे पैसे नहीं होने के कारण कुछ नहीं कर सकते।
मेरे विचार से तो हमें इन सब बातों का खुलकर विरोध करना चाहिए। सम्मान पाना हुनर या काबिलियत की बात होती है। पैसों से कुछ पा भी लिये तो क्या मतलब का?
वह खुशी,वह आत्मशांति नहीं मिलती, जो मेहनत और ईमानदारी से किए गए कार्य में मिलती है। पैसों से खरीद कर खाए गए भोजन से भले हीं तुम्हें क्षण भर की खुशी मिली हो पर वह गुणवत्ता नहीं मिली जो स्वयं के हाथ से बनाए गए भोजन से मिलती है, क्योंकि वह सिर्फ भोजन नहीं होता।वह होता है हमारी मेहनत,हमारा प्रेम, हमारी साधना।
अब कुछ समझे मेरे प्यारे बेटे।”पिता ने गर्व के साथ इतना कहकर सौम्य को सीने से लगा लिया।

प्रखर, निष्पक्ष युवा लेखिका एवं साहित्यकार
शिखा गोस्वामी
मारो (छत्तीसगढ़)

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