सुंदरी अहिरवार की लघुकथा अहंकार

लघुकथा

“अहंकार”

रामेश्वर कुम्हार के दो बेटे थे ,सुदर्शन और दिव्यदर्शन।
गर्मियां आने वाली थीं ।हर साल वह सर्वोत्तम घड़ों का निर्माण करते थे,और उन्हें बाजार में ऊंची कीमतों में बेचते ।
इस बार सुदर्शन ने सोचा क्यों न इस बार अलग से घड़ों का निर्माण करुं, और दिव्यदर्शन से अधिक घड़े बनाऊं और उसको खुद से श्रेष्ठ बनकर दिखाऊं।
इसी मनसा से सुदर्शन ने यह प्रस्ताव पिता के सामने रखा।
सुदर्शन तुम्हें अलग से घड़े के निर्माण करने की क्या आवश्यकता है-
बेटा एकता में शक्ति है , सब कुछ तुम अकेले नहीं कर पाओगे।
सुदर्शन नहीं माना.
वह अलग से ही घड़ों का निर्माण करने में लग गया।
इधर दिव्यदर्शन और पिता साथ मिलकर घड़े के निर्माण करने में लग जाते हैं।
दोनों ने दिन-रात मेहनत करके अतिसुंदर घड़ों का निर्माण कर उन्हे पकाने के लिए भट्टियों का निर्माण किया।
सुदर्शन दिन में काम करता और रात में आराम से सोता।
ऐसे ही सुदर्शन ने काफी घड़ों का निर्माण किया।
एक रात जब सुदर्शन सो रहा था ।तो पिता ने सोचा क्यों न मेरे बेटे की मेहनत से बनाए घड़ों को देखूं।

देखा कि घड़ों का निर्माण सही हुआ। परंतु मिट्टी सही गूंथी नहीं गई।
यादि उनको भट्टी में रखा गया तो सारे फूट जायेंगे।
पिता बहुत परेशान गया और वहां से चला गया। पिता ने यह बात दिव्यदर्शन को बतायीऔर घड़ों को बदलने की सलाह दी ।
दूसरी रात कुम्हार ने सुदर्शन के घड़ों को अपने बनाए घड़ों से बदल दिया और सुदर्शन के बनाये घड़ों को ले गया।
उन घड़ों को मिटा कर नए घड़ों का निर्माण करने की सोचा।
पिता यह करके बहुत खुश होता है।
सुदर्शन ने घड़ों को पक्का कर ऊंची कीमत में बेच दिया ।घड़ों को बेच कर पैसे अपने पिता को देने आया।
सुदर्शन ने दिव्यदर्शन को देखा और कहा-ये अभी तक घड़ों का निर्माण नहीं कर पाया।
पिता ने कहा उसके घड़ों का निर्माण भी हो चुका और उसकी मेहनत का प्रतिफल भी मिल चुका।
सुदर्शन ने अचंभित होकर पूछा । वो कैसे-
पिता ने पूरी कहानी बताई- बेटा सुदर्शन तुम्हारी मेहनत अच्छी थी ।पिता के साये में तो दिव्यदर्शन
ने बहुत अच्छे घड़ों का निर्माण किया परंतु चिंता मुझे तुम्हारी थी ।यदि तुम कच्चे घड़ों को भट्टी में रखते तो वह धूमिल हो जाते और तुम बहुत दुखी हो जाते, इसलिये दिव्यदर्शन से ऐसा करने के लिए कहा।ये सुन कर सुदर्शन की आंखों से आंसुओं की धारा बह पड़ी।
उसने जो कच्चे घड़ों का निर्माण किया था। उनको तीनों ने मिलकर पुनः खुशी से बनाए।
तीनों मिलकर अब हर ग्रीष्म में अच्छे से अच्छे घड़ों का निर्माण करते और उन्हें बेचते और खुश रहते।

स्वरचित रचना
सुंदरी अहिरवार
भोपाल (म0प्र0)

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