राम भरोसे श्री लंका

राम भरोसे श्री लंका
दाने- दाने को मोहताज हुई श्री लंका,
अराजकता की शिकार हुई श्री लंका।
साग-सब्जी के दाम सोने-चाँदी के जैसे,
खूनी आँसू रोने को विवश हुई श्री लंका।

डीजल, पेट्रोल खरीदें तो खरीदें कैसे,
पाई – पाई को मुहताज हुई श्री लंका।
मिट्टी का तेल भी हुआ वहाँ पर मुहाल,
बिजली के झटके से परेशां हुई श्री लंका।

भारत के जैसे उसका भी खान-पान था,
खराब प्रबंधन की शिकार हुई श्री लंका।
बचपन से हम उसका नक्शा देखते आए,
हमारी फिर मदद की मुरीद हुई श्री लंका।

दूसरे देशों पर निर्भर होने से खाई गच्चा,
विदेशी कर्जो की शिकार हुई श्री लंका।
आमदनी औ खर्च की गणित समझी नहीं,
मुफ्तखोरी की शिकार हुई श्री लंका।

पटरी पर उसे लाना पहाड़ काटने जैसा,
भ्रष्टाचार की भी शिकार हुई श्री लंका।
सोने की लंका पे था रावण का अभिमान,
वो फिर राम के भरोसे हुई श्री लंका।

कविता – दुनिया के मालिक

माता सीता के जाने से श्री उसमें जुड़ा,
गलत नीतियों की शिकार हुई श्री लंका,
डूबने न पाए जगवालों सोने की लंका,
चीन की चाल से मूर्च्छित हुई श्री लंका।

रामकेश एम.यादव(कवि,साहित्यकार),मुंबई

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