सुनों फलों के राजा इतना क्यों भाव खाते हो

सुनों फलों के राजा

सुनों फलों के राजा
इतना क्यों भाव खाते हो
आम लोगों की जेब से
अधिक तुम्हारी कीमत
सबके भाग्य में क्यों ना
तुम आते हो।।

सुनों फलों के राजा
इतना क्यों भाव खाते हो।।२।‌

माना स्वादिष्ट बहुत रसीले तुम
हमको खूब ललचाते हो
साल में इक्का-दुक्का दिन आकर
जेब खाली कर जाते हो।।
रह ना पाए कोई भी देख तुमको
फिर भी तुम सताते हो।।

सुनों फलों के राजा
इतना क्यों भाव खाते हो‌।।

अरे सुनो आम तुम वर्ष २०२१में
सौ रुपए में ढ़ाई किलो में आते थे
वर्ष २०२२ में आते-आते अब तुम
सौ रुपए मे डेढ़ किलो भाव बताते हो।।
आम रस, आम जूस , आम पापड़
अचार बन सब मिल इतराते हो।।

सुनों फलों के राजा
इतना क्यों भाव खाते हो।।२

अरे आम बाबू राजा हो तुम हमने माना पर
हक तुम पर सबका क्यों बात ये विक्रेता
को ना समझाते हो।।
गरीब हो या हो अमीर सबकी थाली की
शोभा बन क्यों सबका मन ना भर जाते हो।।
निर्मल जैन की कविता मेरा गाँव

सुनों फलों के राजा
इतना क्यों भाव खाते हो।।२

वीना आडवाणी तन्वी
नागपुर, महाराष्ट्र
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