विद्या शंकर अवस्थी पथिक की तीन रचनाये

मैं कोई साहित्यकार या कवि नहीं
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कविता तो मैंने बहुत लिखीं पर कवि ना अब तक बन पाया
मंचों पर मैं सौ बार गया पर कविता कभी ना पढ़ पाया
अगर कभी कविता भी पढ़ी तो श्रोता को नहीं हंसा पाया
श्रोता अगर कुछ खुश भी हुए तालियां नहीं बजवा पाया
बारातों में तो बहुत गया पर शादी अब तक ना कर पाया
सालियां तो हमको बहुत मिली घरवाली अब तक ना ला पाया

झूठे लोग
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झूठे लोगों की फसल बड़ रही जब से मोबाइल आया है।
खाद का काम करे मोबाइल उत्पादन खूब बढ़ाया है।।
घर में बैठे आराम कर रहे दिल्ली में हूं ये कहते हैं।
चौबीस घंटे में बाईस घंटे झूठ बोलते रहते हैं।।
क्या शिक्षक, क्या ‌ऋषि-मुनी सब झूठ बोलना सीख लिया।
नेताओं का तो कहना क्या झूठ के दम पर राज किया।।
अधिवक्ता तो धरती पर झूठ की रोटी खाते हैं।
ज्यादा से ज्यादा झूठ बोल फिर न्यायधीश बन जाते हैं।।
इसीलिए इस देश में यारों न्याय सदा रोता रहता।
समय पर न्याय नहीं होता न्यायालय भी सोता रहता।।
झूठे लोगों को खोजोगे अस्सी प्रतिशत मिल जायेंगे।
सत्य के सिर पर चढ़ कर के वो अपनी बात मनायेंगे।।
इसीलिए कविवर रहीम ने अपनी बात थी कह डाली।
झूठ से राम नहीं मिलते हैं सत्य से हैं और दुनिया खाली।।
झूठ बोलने वालों की कितनी संख्या बतलाऊं मैं।
गिनने कोई मशीन नहीं तो फिर कैसे गिन पाऊं मैं।।
झूठ बोलने से भी ये पथिक ना अब तक बच पाया।
बचने की कोशिश बहुत करी पर मोबाइल छोड़ नहीं पाया।।
विद्या शंकर अवस्थी पथिक, कानपुर

पुरानी तस्वीर
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तस्वीर जो दिल और दिमाग पर खिंच जाती है वो पुरानी नहीं होती
अपनों की तस्वीर जो दिल में बसी है,बेगानी नहीं होती
मेरी मां और पिता की तस्वीर आज भी एकदम नई दिखती है
उनके साथ बिताए हर पल की यादें तरो ताजा दिखती हैं
जब भी उन्हें ध्यान से देखो तो तस्वीरें मुस्करानें लगती हैं
पास जाओ तो मुझे बेटा-बेटा कहकर बुलाने लगती हैं
तस्वीर कभी पुरानी नहीं होती उनका रंग उतर जाता है
जैसे बचपन से जवानी और फिर बुढ़ापा आ जाता है
वैसे ही तस्वीर के रंग कुछ फीके पड़ जाते हैं
जैसे जवानी से बुढ़ापे में चेहरे पर कुछ दाग आ जाते हैं
अपनों की तस्वीर सदा मस्तिष्क पर उतार कर रखो
कभी पुरानी नहीं होगी जब चाहो हूं बहू निकाल कर देखो
स्वरचित:- विद्या शंकर अवस्थी, “पथिक”, कानपुर

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