चिंतन शीतल सौंदर्य और सीमा


शीतल ने कहा मुझे गर्मी का एहसास ही नहीं होता,
सौंदर्य ने कहा मुझे इतना भरोसा है खुद पर कि मैं इस उजाले से हट ही नहीं सकती, सीमा परेशानी भरे मन से कहीं, मैं तो बादलों से जकड़ी इन हवाओं के राह गिनते गिनते परेशान हूं न जाने हमें धूप कब मिलेगी और बरसात कब होगी!
तभी क्रोध मन में समा कर सीमा से कहता है — तुम परेशान क्यों हो ,सीमाओं का राज और सर्वस्य पीड़ा का इलाज तो खुद यानी स्वयं हो!
इसपर शीतल और सौंदर्य दोनों मुस्कुरा कर कहते हैं –हम दोनों में ना तो क्रोध वास कर सकता है ना कोई सीमा ।

Touch for lovely poetry
तभी सीमा गरज कर कहती है मैं बादलों में छुप सभी का तमाशा देखती हूं ,और समयानुसार सभी को छतिग्रस्त करने की क्षमता और उसका इलाज के दौरान उपाय रेखा दोनों में सम्मोहित एक अंश बनकर हमेशा बैठी हूं।
मैं जब विवाहित होने को सोचती हूं तो भी गरज कर रोना शुरू करती हूं क्योंकि मैं वह सौंदर्य हासिल करना नहीं चाहती और अविवाहित हूं तो भी चिहाड़ फाड़ कर रोती हूं। मेरे नसीब का एक भी कोई धागा टूट न जाए ।
—मंजिल पाने के लिए दुनिया में रास्ते ही रास्ते होते हैं । उस रास्ते में जितने भी चले आए हैं ऊपर की ओर जाते जाते यह बादल अंधेरा कर उन्हें भटकाने का कार्य करता है ।अतः वह वहीं से भटककर नीचे गिर जाते हैं।
इसलिए सीमा कहती है मैं इसी बादल में छुप कर हमेशा उनकी तमन्ना की परवाह करती हूं और उनका ख्याल जो जितना उन्हें नीचे खींचने वाले होते हैं उतनी ही उनकी ऊपर जाने की ताकत होती है। उनकी गति कोई तोड़ न दे इसलिए मैं ऊपर आकाश में चढ़ने वाले व्यक्ति जो रिमझिम सितारों की संग दुनिया में अपना रंगमंच न भूलने की कसम खाए हैं उन्हें मैं उनकी सीमा स्थगित कराने के बाद ही उनमें स्वयं समर्पित हो कल्याण का मार्ग बताती हूं ।

–नीलम शर्मा

Share

Leave a Comment