” उम्मीदें ” नए वर्ष की बेला-दीपक कुमार विश्वकर्मा

” उम्मीदें ” नए वर्ष की बेला

नव वर्ष की बेला देखो
दिन दिन है ये चली आ रही
चेहरों की मुस्काने देखो
दिन दिन है ये बढ़ी जा रही
कहना क्या इन बीते दिवस को
इतिहासों में लिखे जा रहे
अख़बारों के पन्नों पर
हर नए नए दिन छपे जा रहे
लेखा जोखा सालो का
हर पन्ने ओ खुले जा रहे
गिर गए पुराने मकान अगर तो
नए नए है बने जा रहे
कब से रखना कदम दहलीज
सब खड़े इस आशा में
है सोंच विचारो में भी परिवर्तन
इस समय चक्र के पांसा में
विज्ञान छुए आसमान का माथा
इसरो में और नासा में
छोटा छोटा हर बालक
जब आसमान को तकता है
की मुझको भी रखना कदम चांद पर
ओ इसकी दूरी नपता है
नए वर्ष में हर चेहरों पर
एक नया प्रभाकर दिखता है
हर किसान भी अपने मन में
कितनी सुन्दर आशा रखता है
आलू गेहूं सरसो प्याज
इन फसलों में नई उम्मीदें रखता है
नव वर्ष की बेला देखो
कैसे आसमां में कहर ढा रही
ठंडी ठंडी सर्द हवाएं
चारों दिशाओं में घूम रही
सर्द से कांपते होठ और मन
पर इनमें नई योजना झूम रही

दीपक कुमार विश्वकर्मा
फतेहपुर उत्तर प्रदेश

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