अस्त्र-शस्त्र-तलवार-कटारें झलकारी की यही सहेली थीं

वीरांगना झलकारी बाई
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झलकारी बाई नाम था उसका अपनी झलक दिखाई थी।
बुन्देलखण्ड के भोजला गांव में जन्मी, वीरांगना कहलाई थी।।
धन्य हो गई जमुना देवी जिनकी झलकारी बेटी थी।
अस्त्र-शस्त्र, तलवार,कटारें झलकारी की यही सहेली थीं।।
पिता सदोवर सिंह ने उसको बड़े प्यार से पाला था।
छोटी सी उम्र में झलकारी ने तलवार,कटार सम्हाला था।।
निर्भीक, निडर कोमल कन्या दुश्मन से कभी ना डरती थी।
रण में उसके जो आ जाए साहस भर के वो लड़ती थी।।
अस्त्र-शस्त्र में निपुण थी वो शस्त्रों के संग खेली थी।
बर्क्षी,तीर कमान कटारें उसकी वही सहेली थीं।।
पूरन के संग ब्याह हुआ, दुर्गा सेना की नायक थी।
लक्ष्मी बाई की हमशक्ल थी वो रानी की कुशल सहायक थी।।
किले में जब अंग्रेजों ने लक्ष्मी बाई को घेर लिया।
तब झलकारी बाई ने रानी रक्षा प्रण ठान लिया।।
रानी का रूप धरा उसने गोरों को भ्रम में डाल दिया।
रानी लक्ष्मीबाई के प्राणों को उसने बचा लिया।।।
रानी लक्ष्मीबाई के संग उसने भी मन में ठानी थी।
झांसी गोरों को ना दूंगी दे दी अपनी कुर्बानी थी।।
चार अप्रैल १८५७ का वो भी क्या था दिन काला।
मातृभूमि की रक्षा के हित प्राणों की आहुति दे डाला।।
दिखने में साधारण नारी थी पर थी दुर्गा का सदृश रूप।
रणभूमि में वो कूद पड़ी धर रानी लक्ष्मी बाई का रूप।।
बुन्देलखण्ड का हर बच्चा झलकारी बाई को याद करेगा।
इतिहास के एक-एक पन्ने स्वर्णिम अक्षरों से नाम रहेगा।।
पथिक भी ऐसी नारी को कोटि- कोटि
करता वन्दन
वीरांगना झलकारी बाई की वीरता को है शत् बार नमन
स्वरचित:- विद्या शंकर अवस्थी पथिक ,कानपुर

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