पढ़िये सुषमा सिंह की सरस्वती वंदना और मातृभाषा

हिन्दी हमारी मातृभाषा
Hindi world of writers

हिन्द हिमालय और हिन्दी,
यही तो हमारी पहचान है।
हिन्दी है हमारी मातृभाषा,
हम सबकी मंगलगान है।।

मंत्र छंद ऋषियों की वाणी,
दादी नानी की अमर कहानी।
कर्णप्रिय रोचकता से भरपूर,
हिन्दी का विस्तृत वितान है।।

सर्वसुलभ जन जन की भाषा,
शायरों कवियों को भाता ।
पुरातनकाल से अब-तक की,
हिन्दी विशद व्याख्यान है।।

प्रेमसुधा भक्तिभाव जगाती,
दिनकर की ओजस्वी वाणी।
वल्लभाचार्य रैदास व सूरदास,
की मधुरिम जुबान है।।

राम कृष्ण की स्वर्णिम गाथा,
ईश स्तुति और प्रार्थना।
वेद उपनिषद् और रामायण,
हिन्दी हमारी स्वाभिमान है।।

एक थी पानो

: सरस्वती वंदना
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अपने स्वर मेरे स्वर में भर दो,
माॅं वागेश्वरी मुझको यह दो।

विद्या विभूषित होऊं करूं शब्द साधना,
गीत छंद काव्य से करु तेरी आराधना।
कालिदास विद्यापति थे तेरे चाकर,
माॅं मुझपर भी थोड़ी दयाकर।।

बुद्धि विपुल दो ज्ञान अमर दो,
शब्द समृद्धि से मां आंचर भर दो।
ज्ञानाकाश की नक्षत्र बनूं मैं,
मेट अज्ञानता मेघा प्रखर दो।।

प्रज्ञा अधिष्ठात्री मां बुद्धि संचारिणी,
अन्त:करण चेतन प्रकाशिनी।
सद्ज्ञान , सद्प्रयोजन बीते क्षण क्षण,
ज्ञान विज्ञान पर आलोकित कर दो।।

सुषमा सिंह
औरंगाबाद
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( स्वरचित एवं मौलिक)

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